मजबूती का दूसरा नाम- मां
मां के संघर्ष की अनूठी दास्तान फिल्म संवाद का सबसे सशक्त माध्यम मानी जाती है। जब लेखक , संगीतकार , अभिनेता और निर्देशक अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं तो एक बेहतरीन फिल्म पर्दे पर उभरती हैं और सिनेमाघर के अंधेरे में दर्शक का दिल और दिमाग सीधे उस फिल्म के घटनाक्रमों से जुड़ जाता है , किरदारों के भाव उसके मन को छूने लगते हैं , उनका दुख पलकें भीगा देता और विषम परिस्थितियों में हासिल की गई जीत दर्शक के मनोबल को बढ़ा देती है। बहुत समय बाद एक ऐसी ही फिल्म देखी जिसने पलकों को भिगोया भी और हॉल से निकलते वक्त आत्मविश्वास और स्वाभिमान को बढ़ाया भी। फिल्म थी - मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे। एक भारतीय औरत का एक देश के खिलाफ संघर्ष। फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है और फिल्मांकन भी बहुत कसा हुआ और काफी हद तक वास्तविकता के करीब है। बंगाल की एक सीधी सरल लड़की अपनी गृहस्थी बसाने पति के साथ नार्वे पहुंच जाती है और तीन , साढ़े तीन ...