मजबूती का दूसरा नाम- मां

 मां के संघर्ष की अनूठी दास्तान     

फिल्म संवाद का सबसे सशक्त माध्यम मानी जाती है। जब लेखक, संगीतकार, अभिनेता और निर्देशक अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं तो एक बेहतरीन फिल्म पर्दे पर उभरती हैं और सिनेमाघर के  अंधेरे में दर्शक का दिल और दिमाग सीधे उस फिल्म के घटनाक्रमों से जुड़ जाता है, किरदारों के भाव उसके मन को छूने लगते हैं, उनका दुख पलकें भीगा देता और विषम परिस्थितियों में हासिल की गई जीत दर्शक के मनोबल को बढ़ा देती है। बहुत समय बाद एक ऐसी ही फिल्म देखी जिसने पलकों को भिगोया भी और हॉल से निकलते वक्त आत्मविश्वास और स्वाभिमान को बढ़ाया भी।फिल्म थी-मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे। 

एक भारतीय औरत का एक देश के खिलाफ संघर्ष। फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है और फिल्मांकन भी बहुत कसा हुआ और काफी हद तक वास्तविकता के करीब है। बंगाल की एक सीधी सरल लड़की अपनी गृहस्थी बसाने पति के साथ नार्वे पहुंच जाती है और तीन, साढ़े तीन साल में दो बच्चों की मां बन जाती है। बिल्कुल सामान्य भारतीय मां, जो बुरी नजर से बचाने के लिए बच्चों के माथे पर काला टीका लगा देती है, मनुहार कर के हाथ से खाना खिलाती है, बच्चों के साथ एक ही बिस्तर पर सो जाती है।

इस सामान्य भारतीय मां का पति बाहर जाकर कमाता है और कमाई जैसी बड़ी जिम्मेदारी निभाने के बाद गृहस्थी में हाथ बंटाना निहायत ही गैर जरूरी समझता है। घर और बच्चे सिर्फ पत्नि की जिम्मेदारी है क्योंकि उसने तो बड़ी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। नार्वे के नागरिकता पाने को आतुर ये जनाब अवसाद या तनाव में बिल्कुल एक सामान्य भारतीय पुरूष की तरह पत्नि पर हाथ उठाने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है और कभी-कभी इस अधिकार का उपयोग भी कर लेता है।

यही से कहानी में एक मोड आता है ऐसा मोड़ जो पूरे परिवार को एक चक्रव्यहू में धकेल देता है। किसी परिचित द्वारा की गई घरेलू हिंसा की शिकायत पर असल शिकायत को दरकिनार कर  नार्वे की एक सरकारी बाल कल्याण एजेंसी परिवार पर निगरानी शुरू कर देती है, जिसके केंद्र में होते हैं दो मासूम बच्चे।  बच्चों के पालन पोषण के भारतीय तरीके मसलन बिना चम्मच के हाथ से खाना खिलाना, माथे पर काला टीका लगा देना इस एजेंसी को नागवार गुजरते हैं। एजेंसी के कर्मचारियों का आए दिन सुबह-सुबह घर पहुंच जाना, पहले से ही व्यस्त और परेशान मां की परेशानियों को बढ़ा देती है, इन विदेशी कर्मचारियों का वो मेहमानों की तरह ख्याल रखती है और इसी बीच कुछ सामान्य सी गलतियां कर देती है मसलन कमरे में कांच की शीशी टूट जाने पर बड़े बेटे को कांच से दूर रखने के लिए उसे अलग कर दरवाजा बंद कर देना। नर्सरी क्लास के एक प्रोजेक्ट को तय तारीख पर स्कूल में ले जाना भूलना।

बाल अधिकारों के तथाकथित हिमायती उस वक्त एक पांच महीने की बच्ची को घर से उठाकर या यूं कहे कि चुराकर भागते हैं, जब मां बच्चों के पिता को उन लोगों से बात करने के लिए मना रही होती है। तीन साल और पांच माह के बच्चे को सरकारी संरक्षण में रखा जाता है और इससे उपजे दु:ख को मां के ही खिलाफ हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जाता है। फिल्म में कानूनी प्रक्रियाओं को बेहतर प्रस्तुत किया गया है, कुछ न्यायधीश भारतीय मां के पक्ष में दलील सुनते भी है लेकिन मां की भाषा संबंधी सीमाएं और दु:ख से उपजा उतावलापन, कानूनी प्रक्रियाओं के लिए जरूरी धीरज पर हावी हो जाता है। अंतत: बच्चों को व्यस्क होने तक परिवार से दूर रखने का फैसला लिया जाता है।

इस फैसले के बाद जो हुआ, वो परत-दर-परत मानव समाज के सच और झूठ को उजागर करता है। ससुराल में बहू के लक्ष्मी वाले रूप की हकीकत, पति-पत्नि के हमसफर होने की परिकल्पना की हकीकत, समृद्ध और प्रगतिशील देशों के भीतर छुपे लालच, अहंकार और भष्टाचार की हकीकत।

कई घटनाक्रमों से गुजरने के बाद अंतत: गरीब, विकासशील कहे जाने वाले देश भारत की पुरानी अदालत मानवीय धरातल पर मां के हक में फैसला सुनाती है। भारत की अदालत में भी नार्वे की सरकार एक प्रतिनिधि नार्वे को बतौर पार्टी प्रस्तुत करता है और बेरोजगार मां पर सवाल दागता है कि आप बच्चों के स्कूल की फीस कैसे भरेंगी? यदि नहीं भर पाई तो क्या भारत के सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाएगी? और अगर पढ़ाएगी तो वे भविष्य में कितनी तनख्याह पाएंगे। नार्वे के सरकारी वकील की इस दलील पर अपने फैसले के दौरान भारतीय न्यायधीश कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि भारत के शिक्षातंत्र में आज भी इतनी ताकत है कि वो अपने बच्चों को भविष्य के लिए तैयार कर सके और अपने पैरों पर खड़ा रहने की ताकत दे सके।

बहुत छोटी लेकिन बहुत महत्वपूर्ण बात है कि भारत के शिक्षातंत्र के बारे में यह धारणा किसने बनाई? यदि यह तंत्र इतना ही बुरा है तो क्यों हर साल बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे युवक-युवतियों को करोडों के वेतन के प्रस्ताव भेजकर नौकरी करने बुलाती हैं। क्यों हर बड़ी कंपनी में शीर्ष पद पर एक भारतीय नाम दिखाई देता है?

हमारे देश में बारे में विश्व क्या धारणा बनाएगा, यह बहुत कुछ हम पर निर्भर करता है। क्यों अपना देश छोड़ते ही हम खुद, अपने ही लोगों, अपनी ही परंपराओं,  अपनी ही भाषाओं की उपेक्षा करने लगते हैं। भाषा की उपेक्षा तो लोग अब देश में रहकर ही करने लगे है। यह फिल्म कई सवाल छोड़ती है, हम भले ही विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करे पर क्या हमें अपने आर्थिक शक्ति होने पर इतना आत्मविश्वास है कि पैसा कमाने के लिए अपना देश नहीं छोड़ेंगे।

मां के मंदिर में हर नवरात्रि भीड़ लगाने वाले हम लोग क्या अपने बच्चों की मां, अपने भतीजों के मां और अपनी मां की इज्जत करना सीख गए है?

इस फिल्म में नार्वे में जो हुआ, उसे एक घटना करार दिया जा सकता है लेकिन जो हमारे घरों में, परिवारों में होता है, वो तो हमारे सामाजिक ताने-बाने का अंग बन चुका है। इस फिल्म में दोनों पहलू बहुत खूबसूरती से फिल्माएं है, एक पिता है जो बच्चों के छिने जाने पर भी पराए देश की नागरिकता पाने को व्याकुल है। दूसरी ओर एक मां है, जो बेरोजगार होकर भी बच्चों का दायित्व हासिल करने के लिए उतावली है और अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए किसी भी आर्थिक मदद के लिए इंकार करने का दम रखती है।

प्रवासी भारतीयों को यह फिल्म जरूर देखना चाहिए क्योंकि देखने, सोचने और समझने के लिए बहुत कुछ है। जिन माता-पिता के विदेशों में सैटल काबिल बेटे शादी की उम्र में पहुंच गए हैं और सर्वगुण सम्पन्न बहू की तलाश जारी है उन्हें भी यह फिल्म देखनी चाहिए और आंख मूंद कर बेटे की काबिलियत के कसीदे पढ़ने की बजाय उसके व्यक्तित्व की गहराई को परखना चाहिए।

जो माता-पिता अपनी रानी बेटियों को विदेशी दूल्हे से ब्याहने की तैयारी में हैं, उन्हें भी यह फिल्म देखना चाहिए और आंख मूंद कर यह मान लेने की बजाय कि विदेश में है तो आधुनिक होगा, अंग्रेजी बोलता है तो सभ्य ही होगा, विदेश में हैं तो लाखों में कमाता होगा, वास्तविकता के धरातल पर दूल्हे की वित्तिय स्थिति और  व्यक्तित्व  के भावनात्मक स्तर का आंकलन जरूर कर लेना चाहिए।

हर मां को भी यह फिल्म देखना चाहिए क्योंकि बहुत मजबूती से यह फिल्म कह देती है कि मां बनना कमजोरी की नहीं बल्कि मजबूती की निशानी है।  अंत में सागरिका चटर्जी को साधुवाद जिनके जीवन के असल संघर्षों पर यह फिल्म आधारित है।

#nrilife 

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