अंर्तमन को तृप्त करने वाला वीकेंड

 

हमारी जिंदगी में कुछ दिन ऐसे आते हैं, जो आते एकदम धीमे हैं, हमें उस दिन से कोई खास अपेक्षा नहीं होती, उस दिन को बीताने का कोई स्पेशल प्लान नहीं होता और अनपेक्षित रूप से वो दिन कुछ ऐसा दे जाते हैं,  जो हमेशा याद रह जाता है। इस वीकेंड मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। दुबई में रहने वालों के ज्यादातर वीकेंड शुक्रवार की रात लेटनाईट मुवी से शुरू होते हैं, अगली सुबह देर से उठना, ब्रेकफ्रास्ट और लंच मिलाकर ब्रंच कर लेना और थोड़ा सुस्ताने के बाद ढलती शाम से देर रात तक घुमना-फिरना, दोस्तों से बतियाना। यह शहर आपको खुश रहने के बहुत सारे मौके देता है बशर्तें आप इस शहर में जीने की कठिन शर्तों को आप ने अपनी आदत में बना लिया हो। खैर यह ब्लॉग दुबई के उन  आकर्षणों के बारे में नहीं हैं, जिस पर दुनिया रिझ जाती है। ये उस कथा के बारे में हैं, जो हमें बाहरी चमक-दमक से भीतर की ओर जाने की राह दिखाती है। 



बीते दिनों दुबई के सिंधी सेरेमॉनियल हॉल में दो दिवसीय भागवत चिंतन का आयोजन हुआ। मालवा के संत श्री प्रभुजी नागर (सुपुत्र संत श्री कमल किशोर जी नागर) के श्रीमुख से भागवत चिंतन सुनने का अवसर मिला। कार्यक्रम में जाने की मेरे पास तीन वजह थी,पहली की मेरी सहेली का परिवार कथा का आयोजक या यूं कहे कि यजमान था। दूसरी वजह थी, कि मैंने भागवत जी नहीं पढ़ी लिहाजा सुनने का मौका नहीं छोड़ना चाहती थी और तीसरी वजह थी कि मेरी दादी संतश्री कमल किशोर जी नागर की कथा टीवी पर सुनती थी तो उनके सुपुत्र को सुनने का सहज आकर्षण था।

कथा स्थल पर भी वही सादगी विद्यमान थी, जो मालवा के भोले लोगो में अभी भी थोड़ी बची हुई हैं। भारत में पत्रकारिता के दौरान मैंने कुछ कथाएं बतौर रिपोर्टर कवर की, आदरणीय संतों के इंटरव्यू लिए, कथा के पांडालों की भव्यता के बारे में खबरें लिखी। इन सब के दौरान जो बात अनकही रह गई, वह यह थी, कि धर्म और आध्यात्म में कभी-कभी भव्यता और प्रचार इतना हावी हो जाता है कि धार्मिक आयोजन का मूलतत्व उस भव्यता की चमक के सामने फीका पड़ जाता है। अपनी चमक-दमक के लिए मशहूर दुबई शहर में ऐसा नहीं हुआ, आयोजन के नाम पर उतनी ही साज सज्जा थी, जितनी व्यासपीठ की गरिमा को बनाए रखने के लिए जरूरी है। प्रभु जी नागर ने अपना परिचय देने के बाद बोलना शुरू किया तो ढ़ाई घंटे कहां बीत गए पता ही नहीं चला। उन्होंने कहा कि जीवन में तीन '' कभी मत भूलना झूलना, झेलना और झुकना। जिन लोगों ने यह तीन बातें सीख ली, वे जीवन की चुनौतियों से आसानी से पार पा जाते हैं। पहली हैं झूलना। जीवन कभी स्थिर नहीं होता, जिंदगी की चाल झूले की तरह ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, तेज-धीमा होती रहती हैं, जो लोग इसे स्वीकार कर आनंद लेना सीख जाते हैं वो सुखी रहते हैं। दूसरी हैं –झेलना। जीवन में ऐसा बहुत कुछ होगा जिसे झेलना पड़ेगा। यह जिम्मेदारियों का बोझ, अपमान, दुर्व्यवहार कुछ भी हो सकता है। ऐसा कुछ हो तो झेल लेना क्योंकि भगवान ने बालपन में गोवर्धन को झेल लिया था, जब शिशुपाल ने अपमान किया तो उसकी सौ गालियों को झेल लिया था। जहां झेलना ही अनिवार्य हो, वहां कुछ बातों को हंसकर झेल लेना क्योंकि स्वयं भगवान ने कई बातों को मुस्कुराकर झेला है। तीसरा '' हैं- झुकना। जिन्होंने झुकना सीख लिया, उन्होंने जीना सीख लिया।

उन्होंने कई रूचिकर प्रसंग और लोककथाएं सुनाई। साथ ही गृहस्थ आश्रम का महत्व भी बताया। उन्होंने कहा कि लोग भक्ति और सत्संग को वृद्धावस्था के लिए छोड़ देते हैं और सोचते हैं कि जब सबकुछ हो जाएगा, तब इस ओर मन लगाएगा। या कभी-कभी कहते हैं कि हमें गृहस्थी की जिम्मेदारियों से मुक्ति ही नहीं मिलती है कि हम भक्ति के बारे में सोचे। ऐसा सोचना और कहना गलत हैं। गृहस्थाश्रम ही जीवन का वह काल हैं, जिसमें आप चारों आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) को एक साथ जी सकते हैं। सोचिए, यदि दुनिया में गृहस्थ ना होते हैं तो राम और कृष्ण किसके घर में अवतार लेते?

थोड़े से समय में बहुत से बातें बतलाकर, गागर में सागर भरकर भागवत चिंतन ने विराम लिया। उस वीकेंड जब लोग कथा से घर लौटे होंगे तो मन के भीतर ठंडक और अंर्तमन की तृप्ति के साथ लौटे होंगे।    

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