प्रवासी भारतीय दिवस के बहाने
बीते दिनों मेरे इंदौर में प्रवासी भारतीय सम्मेलन हुआ। इंदौर भी सज-संवरकर प्रवासियों के स्वागत के लिए तैयार हो गया। सम्मेलन के पहले से ही सोशल मीडिया पर इंदौर छाया हुआ था, रंगबिरंगा राजबाड़ा, चमकते दमकते चौराहे और ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर की चकाचौंध तो देखते ही बनती थी। जैसे-जैसे सम्मेलन करीब आया सोशल मीडिया पर लोगों के सुर बदलने लगे। किसी ने कहा कि बेवतनों को वतन याद आ गया, किसी ने कहा कि ये प्रवासी नहीं पलायनवादी लोग है, सोशल मीडिया की कुछ टिप्पणियां मुझे अकसर उद्वेलित करती है फिर मैं खुद को याद दिलाती हूं कि सबकी अपनी-अपनी सोच है, हम कौन होते हैं उस पर कमेंट करने वाले। फिर भी ऐसा लगता है कि कभी-कभी बोलना जरूरी हो जाता है। पिछले दिनों मैंने प्रवासी भारतीय सम्मेलन की निंदात्मक टिप्पणी पढ़ी जिसमें सवाल उठाया गया था कि जनता के टैक्स के पैसे से प्रवासियों को भोजन क्यों करवाया गया? किसी ने आरोप लगाया कि प्रवासी भारतीय तो पैसों के लालच में देश छोड़कर जाते हैं, इनको क्यों सम्मान देना? जाहिर सी बात है कि पढ़ने के बाद दुख हुआ और लगा कि अब बोलना जरूरी है। चलिए सबसे प...