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Showing posts from January, 2023

प्रवासी भारतीय दिवस के बहाने

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      बीते दिनों मेरे इंदौर में प्रवासी भारतीय सम्मेलन हुआ। इंदौर भी सज-संवरकर प्रवासियों के स्वागत के लिए तैयार हो गया। सम्मेलन के पहले से ही सोशल मीडिया पर इंदौर छाया हुआ था, रंगबिरंगा राजबाड़ा, चमकते दमकते चौराहे और ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर की चकाचौंध तो देखते ही बनती थी। जैसे-जैसे सम्मेलन करीब आया सोशल मीडिया पर लोगों के सुर बदलने लगे। किसी ने कहा कि बेवतनों को वतन याद आ गया, किसी ने कहा कि ये प्रवासी नहीं पलायनवादी लोग है, सोशल मीडिया की कुछ टिप्पणियां मुझे अकसर उद्वेलित करती है फिर मैं खुद को याद दिलाती हूं कि सबकी अपनी-अपनी सोच है, हम कौन होते हैं उस पर कमेंट करने वाले। फिर भी ऐसा लगता है कि कभी-कभी बोलना जरूरी हो जाता है। पिछले दिनों मैंने प्रवासी भारतीय सम्मेलन की निंदात्मक टिप्पणी पढ़ी जिसमें सवाल उठाया गया था कि जनता के टैक्स के पैसे से प्रवासियों को भोजन क्यों करवाया गया? किसी ने आरोप लगाया कि  प्रवासी भारतीय तो पैसों के लालच में देश छोड़कर जाते हैं, इनको क्यों सम्मान देना? जाहिर सी बात है कि पढ़ने के बाद दुख हुआ और लगा कि अब बोलना जरूरी है। चलिए सबसे प...

हर ओर खिलखिलाती है हमारी हिंदी

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    विश्व हिंदी दिवस विशेष भाषा सीखने और उसे अपनाने की शुरूआत तब ही हो जाती है , जब हम अपना नाम तक बोलना नहीं जानते। संवाद का यह माध्यम धीरे - धीरे हमारी पहचान में तब्दील हो जाता है। भाषा के प्रति रूझान ज्यादा हो या जीवन की बारीकियों को समझने और समझाने की कला आती हो तो भाषा से मिली यह पहचान एक दिन भाषा के प्रति प्रेम में बदल जाती है। हां , हमें भाषा से प्रेम हो जाता है , खासकर उस भाषा से जिस भाषा में   हमारी मां ने हमसे प्रेम जताया हो , जिस भाषा में हमें डपट लगाई हो , जिस भाषा में पिता ने समझाया हो , झिडका हो , डराया हो , सहलाया हो , संबल बढाया हो। जिस भाषा में हमने खेला हो , गुनगुनाया हो , ईश्वर के समाने अर्जियां लगाई हो या दिल में अरमानों को सजाया हो , उस भाषा से प्रेम होना तो स्वभाविक है।   इन दिनों प्रेम का यही माध्यम अहम के टकराव का भी कारण बनता जा रहा है। हिंदुस्तानी संदर्भों में तो यह टकराव कही - कही बहुत ...