हर ओर खिलखिलाती है हमारी हिंदी
विश्व हिंदी दिवस विशेष
भाषा सीखने और उसे अपनाने की शुरूआत तब ही हो जाती है, जब हम अपना नाम तक बोलना नहीं जानते। संवाद का यह माध्यम धीरे-धीरे हमारी पहचान में तब्दील हो जाता है। भाषा के प्रति रूझान ज्यादा हो या जीवन की बारीकियों को समझने और समझाने की कला आती हो तो भाषा से मिली यह पहचान एक दिन भाषा के प्रति प्रेम में बदल जाती है।
हां, हमें भाषा से प्रेम हो जाता है, खासकर उस भाषा से जिस भाषा में हमारी मां ने हमसे प्रेम जताया हो, जिस भाषा में हमें डपट लगाई हो, जिस भाषा में पिता ने समझाया हो, झिडका हो, डराया हो, सहलाया हो, संबल बढाया हो। जिस भाषा में हमने खेला हो, गुनगुनाया हो, ईश्वर के समाने अर्जियां लगाई हो या दिल में अरमानों को सजाया हो, उस भाषा से प्रेम होना तो स्वभाविक है।
इन दिनों प्रेम का यही माध्यम अहम के टकराव का भी कारण बनता जा रहा है। हिंदुस्तानी संदर्भों में तो यह टकराव कही-कही बहुत मुखर नजर आता है। अखबार में नौकरी करते समय मुझे कई लोग कहते थे कि आप अखबार वाले ऊर्दू बहुत इस्तेमाल करते हो। मैं अकसर कहती थी कि ऊर्दू नहीं ये अखबारी भाषा है, इसे हिंदुस्तानी भी कहते हैं। आप भी बताईए कि हम दोनों वार्तालाप कर रहे हैं और हम दोनों बात कर रहे हैं। इसमें से कौन से वाक्य में अपने करीब नजर आता है? जाहिर सी बात है कि हम दोनों बात कर रहे हैं।
कई बार कुछ लोगों से मुलाकात होती और वो कहते कि हर तरफ अंग्रेजी का बोलबाला है, अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन हिंदी खत्म हो जाएगी। इस तरह की चिंताएं मुझे बहुत हैरान कर देती थी। मजेदार बात यह है कि जिन लोगों को भाषा की विलुप्ती की इतनी चिंता है, उनमें से ज्यादातर ने अपनी नई पीढ़ी को शिक्षा दिलाने में हिंदी की बजाय अंग्रेजी को प्राथमिकता दी। कई लोग तो स्कूली शिक्षा में द्वितीय और तृतीय भाषा के रूप में भी किसी विदेशी भाषा को चुन लेते है और बाद में कहते हैं कि हिंदी में कोई फ्यूचर नहीं बचा।
खैर, विश्व हिंदी दिवस के इस मौके पर मेरा इरादा या शुद्ध हिंदी में कहूं तो मेरा मंतव्य निर्णायक बनकर लोगों की सोच का तुलनात्मक अध्ययन कर फैसला सुनाने का नहीं है। एक हिंदी प्रेमी होने के नाते इतना जरूर कहना चाहूंगी कि मैं हिंदी के अच्छे भविष्य के प्रति आश्वस्त हूं। अपनी भाषाई विरासत कुछ लोग व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों या कारणों से अपनी नई पीढ़ी को नहीं सौंप पाए तो उनके जीवन के लेखे-जोखे में से भाषा
रूपी अहम तत्व विलुप्त होगा। इसकी जिम्मेदारी भी उनकी ही होगी।
बहरहाल हिंदी की वर्तमान स्थिति और उसके बेहतर और समृद्ध भविष्य का आश्वासन मुझे देश की सीमाओं को लांघने के बाद मिला। लगभग आठ वर्ष पूर्व मैंने संयुक्त अरब अमीरात के दुबई शहर में अपना नया बसेरा बसाने की शुरूआत की। शुरूआती दौर में मुझे भी लगा कि धीरे-धीरे मैं अंग्रेजी में और अंग्रेजी मुझ में समा जाएगी क्योंकि मेरे आस-पास हिंदी बोलने वालों की संख्या कम थी हालांकि हिंदी समझने वाले बहुत थे लेकिन अपने ही पूर्वाग्रहों की वजह से बोलते नहीं थे। जब जान-पहचान का दायरा बढ़ा तो अपनी भाषा में बातचीत के लंबे-लंबे दौर शुरू हुए। ऐसी एक बातचीत में एक सिंधी आंटी ने बताया कि सिंधी में अरबी (आलू की तरह दिखने वाली सब्जी) को कचालू कहते हैं। मैं तुरंत बोल पड़ी अच्छा आंटी यानी बच्चों की कविता आलू-कचालू बेटा कहा गए थे, हिंदी और सिंधी का मेल है। हम दोनों मुस्कुरा दिए। एक रियल स्टेट कंपनी के लिए काम करते वक्त जब मकानी एप देखी तो पाया कि मकान शब्द मूलत: अरबी शब्द है, जो देश की सीमा को लांघ कर हिंदी में भी मकान बन गया और दुकान भी। मेरी एक हमनाम बंगाली सखी मिली जिसका नाम नुपोर हैं और मैं नुपूर।
जिस संस्था के लिए मैं काम करती थी, एक बार वहां के क्रिएटिव डायरेक्टर जो कि मूल रूप से इजिप्ट के रहने वाले थे, ने गुरू शब्द पर लंबी चर्चा की। वो जानना चाह थे कि आखिर गुरू शब्द का प्रयोग कब और किसके लिए करना उचित है। दरअसल वे एक ब्रांड में जो कि शिक्षा संबंधी सेवाओं से संबंधित था, हिंदी के इस शब्द का प्रयोग करना चाह रहे थे। उनसे चर्चा करने के बाद इस बात की खुशी हुई कि जिस व्यक्ति ने हिंदुस्तान की जमीं पर कभी पैर नहीं रखा, वो हिंदी के एक शब्द पर विस्तार से चर्चा कर रहा है। इसी तरह की हैरानी एक अन्य सहकर्मी की बातों से हुई जब उसने बाप शब्द के बारे में पूछा, वो मूलत: अल्जीरिया की निवासी थी और अल्जीरिया से नौकरी करने दुबई पहुंची थी। बाप शब्द उसने हिंदी फिल्मों में सुना था, हालांकि उसे हिंदी नहीं आती थी लेकिन हिंदी फिल्मों के शौक ने उसकी पहचान कुछ शब्दों से करवा दी थी।
खैर, यह सब तो बहुत व्यक्तिगत उदाहरण है। पिछले दिनों किसी काम के सिलसिले में दुबई स्थित अमेरिकी दूतावास में जाने का मौका मिला। वहां बड़ी संख्या में अमेरिका वीजा के लिए आवेदन कर चुके, भारतीय मूल के आवेदनकर्ता मौजूद थे। आवेदनकर्ताओं को निर्देश देने के लिए टीवी स्क्रीन पर कुछ वीडियो चल रहे थे। ये वीडियो एक बार अंग्रेजी, दूसरी बार अरबी और तीसरी बार हिंदी में चलते थे और फिर इसी क्रम में उनकी पुनरावृत्ति होती थी। यह भी अपने आप में मजेदार था एक देश, किसी अन्य देश में अपने दूतावास में हिंदी में निर्देश जारी कर रहा था। कारण भी साफ था, बड़ी संख्या में भारतीय आवेदनकर्ताओं की मौजूदगी।
दुबई के कुछ इलाकों में आप पैदल सैर पर निकलेंगे तो रेस्तरां के नाम में हिंदी ही हिंदी पाएंगे मसलन रसोईघर, राजधानी, भूक्कड, छप्पन भोग, महाराजा भोज। यह महज कुछ उदाहरण है जो बताते हैं कि हिंदी अब हिंदुस्तान की सीमाओं से बाहर भी खिलखिलाती है, मुस्कुराती है।
हिंदी में ही एक कहावत है घर की मुर्गी दाल बराबर। हमें बस इसी बात पर गौर करना होगा कि हम अपने ही घर में अपनी भाषा की उपेक्षा ना कर बैठे। कुछ दिनों पहले की बात है मुंबई से कुछ दोस्त परिवार के साथ दुबई घूमने आए थे, हमारे घर में भी आए। भोजन परोसते वक्त मैंने ग्यारह साल की एक बच्ची से पूछ लिया, बेटा अचार लोगे? उसे समझ नहीं आया। तुरंत उसकी मां बोल उठी, पिकल लेगी बेटा, पिकल। फिर मेरी ओर देखकर बोली, इसे हिंदी नहीं आती। मुझे थोड़ी हैरानी हुई क्योंकि अचार, चटनी, पापड बड़े सामान्य से रोजमर्रा के शब्द है। अगर ये शब्द नई पीढ़ी के शब्दकोष से हट रहे हैं यानी कि हिंदी अपने ही घर में उपेक्षित बुजुर्ग सी होने की ओर बढ़ रही है।

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