प्रवासी भारतीय दिवस के बहाने
बीते दिनों मेरे इंदौर में प्रवासी भारतीय सम्मेलन
हुआ। इंदौर भी सज-संवरकर प्रवासियों के स्वागत के लिए तैयार हो गया। सम्मेलन के पहले
से ही सोशल मीडिया पर इंदौर छाया हुआ था, रंगबिरंगा राजबाड़ा, चमकते दमकते चौराहे और
ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर की चकाचौंध तो देखते ही बनती थी। जैसे-जैसे सम्मेलन करीब
आया सोशल मीडिया पर लोगों के सुर बदलने लगे। किसी ने कहा कि बेवतनों को वतन याद आ गया,
किसी ने कहा कि ये प्रवासी नहीं पलायनवादी लोग है, सोशल मीडिया की कुछ टिप्पणियां मुझे
अकसर उद्वेलित करती है फिर मैं खुद को याद दिलाती हूं कि सबकी अपनी-अपनी सोच है, हम
कौन होते हैं उस पर कमेंट करने वाले। फिर भी ऐसा लगता है कि कभी-कभी बोलना जरूरी हो
जाता है। पिछले दिनों मैंने प्रवासी भारतीय सम्मेलन की निंदात्मक टिप्पणी पढ़ी जिसमें
सवाल उठाया गया था कि जनता के टैक्स के पैसे से प्रवासियों को भोजन क्यों करवाया गया?
किसी ने आरोप लगाया कि प्रवासी भारतीय तो पैसों
के लालच में देश छोड़कर जाते हैं, इनको क्यों सम्मान देना?
जाहिर सी बात है कि पढ़ने के बाद दुख हुआ और लगा कि
अब बोलना जरूरी है। चलिए सबसे पहले बात करते हैं पैसों के लालच में देश छोड़ने की। हां,
लोग पैसा कमाने, नौकरी तलाशने के लिए विदेश जाते है लेकिन आप ने यह नहीं देखा कि नौकरी
करने विदेश जाने वाले देश के भीतर आरक्षण या नौकरी की मांग को लेकर ट्रेन की पटरियां नहीं
उखाडते। भारत बंद नहीं करवाते। जब उन्हें लगता है कि शायद यहां रहकर वो अपने परिवार
की जरूरतें पूरी नहीं कर सकते, तो वो अपना बैग पैक कर निकल जाते हैं किसी अनजान देश
की तरफ। यहां शुरू होती है अग्निपरीक्षा। खाड़ी
देशों में काम करने वालों से पूछिए तो वे बताएंगे कि जब वो इस देश में नए थे तो 45
डिग्री सेल्सियस की धूप में कैसे पैदल चलते थे? कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में रहने वालों
से पूछिए कि कैसे शुरूआती दौर में भरी ठंड में ऑफिस लौटने के बाद सिर्फ ब्रेड और बटर
खाकर गुजारा किया था।
हम अपने ही देश में नौकरी करते हुए कई बार चिढ़चिढ़ा
जाते हैं, जरा सोचिए इन लड़कों और लड़कियों के बारे में। जब ये परदेश में नौकरी शुरू
करते हैं तो घर लौटने के बाद कोई इनके हाथ में खाने की थाली नहीं देता। कोई सुबह ये
बोलकर नहीं उठाता कि बेटा उठ जाओ, ऑफिस के लिए देर हो जाएगी। ये लोग अंदर और बाहर हर
चुनौती से लड़ते हैं, काम करते हैं, बेहतरीन तरीके से करते हैं, तारीफें भी पातें है
और ना केवल अपना बल्कि अपने स्कूल, कॉलेज, शहर, प्रदेश, देश सबकी इज्जत बढ़ाते हैं।
इनकी कमाई यही प्रतिष्ठा बाद में नए लडके-लड़कियों के लिए विदेशों में नौकरी के दरवाजे
खोलती है।
अब बात दूसरे सवाल की कि प्रवासियों को जनता के टैक्स
के पैसे भोजन क्यों करवाया गया? लिखने वाले को शायद पता नहीं होगा कि जो लोग भी इस
सम्मेलन में आए उन्होंने इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए अच्छा खासा रजिस्ट्रेशन
शुल्क दिया। जाहिर सी बात है कि उन्होंने आम जनता के टैक्स के पैसों से भोजन नहीं किया।
आप भी देश में किसी कांफ्रेंस में भाग लेने जाते हैं और तगडी रजिस्ट्रेशन फीस भरते
हैं तो क्या आयोजकों की ओर से आयोजित भोजन और चाय को ग्रहण नहीं करते? ये भोजन और चाय का वक्त ही होता है जब मुख्य आयोजन से परे आपको अपने क्षेत्र के लोगों से व्यक्तिगत मेल मुलाकात का मौका मिल जाता है।
तीसरी टिप्प्णी थी कि बेवतनों को घर की याद आ गई। ये किसी की व्यक्तिगत टिप्पणी थी पर हो सकता है कि ऐसी ही सोच कुछ अन्य लोग भी रखते हो तो उनकी जानकारी लिए बता देते हैं कि प्रवासी भारतीय बेवतन नहीं होते बल्कि वो दो देशों को अपना कह सकते हैं। एक देश उन्हें जन्म से मिला और दूसरे ने उन्हें, उनके कर्म और कौशल की वजह से अपनाया। विदेशों में रहने वाले भारतीयों में बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो मरते दम तक भारत की नागरिकता नहीं छोड़ते, वे भले ही विदेश में रहे ताउम्र भारतीय रहते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग स्वेच्छा से भारतीय नागरिकता को त्याग देते हैं और अन्य देश की नागरिकता ले लेते हैं। ऐसे लोगों को भी भारत की सरकार ओसीआई ओवरसीज सिटीजन्स ऑफ इंडिया की श्रेणी में रखती है, वे जब चाहे अपने देश लौट सकते हैं।
इंदौर प्रशासन ने सूखी घास पर हरा रंग डलवाया, ये
कुछ अजीब सी हरकत थी। ठंड का मौसम है घास सूखी होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रह
था। दूसरी बात मुख्य समारोह में कई प्रवासियों को बैठने की जगह नहीं मिली, यह भी इस
पूरे सम्मेलन का एक दुखद प्रसंग रहा है। इंदौर प्रशासन के पास कुल अतिथियों की संख्या
का सही आंकड़ा जरूर पहुंचा होगा, उस पर भी ऐसी व्यवस्था मानो मखमल के कपड़े पर टाट का
पैबंद लगा दिया हो। जिन लोगों ने यह अनर्गल टिप्पणियां की है, उम्मीद है कि इतने विस्तार
से समझाने के बाद उनकी गलतफहमियां दूर हुई होंगी। हम प्रवासी भारतीय आपके ही दोस्त,
सहेलियां, सहपाठी, सहकर्मी थे परिस्थितयों और किस्मत ने साथ मिलकर हमारे शहर बदल दिए।
हम अब भी वहीं है, जो थे। उम्मीद है कि आप भी इस कडवेपन को मन से निकाल देंगे।
#pravasibhartiyadivas2023 #Indore


अत्यंत सार्थक एवं सारगर्भित विवेचना प्रस्तुत की है आपने... सोशल मीडिया पर थोड़े बहुत नकारात्मक कमेंट चलते रहते हैं उन्हें अनदेखा किया जाना चाहिए प्रवासी भारतीय अपने ही लोग हैं सारी दुनिया में हिंदुस्तान का परचम घर आ रहे हैं सनातन संस्कृति एवं मूल्यों का सारी दुनिया में प्रचार प्रसार एवं संवर्धन इन्हीं की देन है सभी प्रवासी भारतीयों को हार्दिक शुभकामनाएं बधाई
ReplyDeleteप्रवासी भारतीय हिंदुस्तान एवं सनातन संस्कृति के गौरव हैं सारे संसार में हिंदुस्तान का परचम थामकर प्रवासी भारतीय हमें गौरव प्रदान करते हैं हिंदुस्तान सभी प्रवासी भारतीयों का अपना सनातन राष्ट्र है बड़े आयोजन में छोटी मोटी गलतियां होती रहती है उससे सबक लेना चाहिए उसको ढाल बनाकर अनावश्यक नकारात्मक टिप्पणियों से बचा जाना चाहिए
ReplyDeleteप्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ।
ReplyDeleteबहुत ही सार्थक और सटीक उत्तर..
Deleteआज अगर किसी देश का नागरिक अपने देश से विदेश रोजगार की तलाश में निकलता है तो इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि उस देश में अपने सभी नागरिकों के लिए उचित अवसर नहीं है... ऐसे में उस व्यक्ती का बाहर जाना देश के अंदर प्रतियोगिता को कम ही करती है.
साथ ही सूचना और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ आज जब TCS, Infosys आदी कम्पनियाँ बाहर अपने इंजीनियर्स भेजकर लाखों करोड़ों डॉलर देश में ला रहीं है, तो यह भी इन्हीं NRI की वज़ह से ही.
भारत की संस्कृति, खानपान, भाषा, वस्त्र आदि के प्रचार प्रसार में यहीं अप्रवासी भारतीय एक दूत जैसा कार्य करते है.
और आज जो निंदा कर रहे है, कल जब उनके बच्चे विदेश उड़ने को तय्यार होंगे तो यहीं लोग शान से सबको बताते जाएंगे