Posts

Showing posts from June, 2023

गणित, ज्योतिष गणना और साहित्य का अनूठा संयोग

Image
  आज मनेगा महाकवि कालिदास का जन्मदिवस संस्कृत के साहित्यकारों पर बात हो तो सर्वप्रथम महाकवि कालिदास का नाम आता है। विश्व के इस महानतम साहित्यकार की कृतियों को समय भी पुराना नहीं कर पाया। विश्व साहित्य में कालजयी कही जाने वाली इन कृतियों के रचियता ने कही भी स्वयं के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा। संस्कृत के विद्वान भी उनकी रचनाओं के आधार पर उनकी जन्मतिथि और जन्मस्थान   के बारे में अनुमान लगाते रहे हैं। कितनी अद्भुत बात है कि हर क्षेत्र के विद्वानों ने उन्हें अपने क्षेत्र से संबंधित सिद्ध करने का प्रयास किया। काश्मीर के विद्वानों ने कहा कि वे काश्मीर के थे। वहीं उनके ग्रंथों में उज्जैन का जो सुंदर और विस्तृत वर्णन मिलता है, उसे देखकर विद्वानों ने कहा कि वे उज्जैन के थे। कुछ विद्वानों ने उनका जन्मस्थान बंगाल को बताने का भी प्रयास किया। उनके साहित्य में भगवान महांकाल की आरती, शिप्रा नदी के तट, महांकाल वन, उज्जैन के बाजारों के इतने सुंदर और विस्तारित वर्णन मिलते हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद इस बात पर सहसा यकीन हो जाता है कि उन्होंने जरूर जीवन का लंबा समय उज्जैन में बीताया होगा। इसी...

नर्मी वाली गर्मियां

Image
  नर्मी वाली गर्मियां जब सूरज आग उगलता हैं, धरती का पारा चढ़ता है, तभी कुछ दिलों में, उमंगों का सैलाब उमड़ता है   नाती-पोते घर आएंगे सूने आंगन में बहार लाएंगे हंसी किलकारी घर में गूंजेगी बातों-बातों में सारी रात बीतेगी   इन दिनों में उमंगों पर भारी मशीनों का जोर हैं ठहाकों से ज्यादा मोबाईल का शोर है   एक वो गर्मियां भी थी जब आम की मिठास और कैरी की खटास के बीच खुलते थे कई हल्के-फुल्के राज   मिलती थी समझाईशे भी होता था रूठना मनाना भी   कभी होता था खाने का मनुहार कभी पड़ती थी शरारतों पर फटकार नानी-दादी के दुखते पैरों पर नन्हें कदम करते थे कदमताल टांग भी खींचती थी आंसू भी गिरते थे भीगे हुए चेहरे पर फिर हंसी खिल जाती थी   वो मेरे बचपन की गर्मियां थी गर्म होने के बावजूद उनमें प्यार की नरमी थी

हां, मैं कैक्टस हूं

Image
         मैं कैक्टस हूं कंटीला हूं, चुभता हूं पर खड़ा रहता हूं   गर्म हवा के थपेड़ों में वीरान रेगिस्तानों में   ना हरी पत्तियां ना फूल ना फल हैं मेरे पास ना बहारों का बसेरा ना तितलियों का डेरा है फिर भी इस धरा पर इक खास वजूद मेरा हैं   क्योंकि तपती भूमि पर नए जीवन का अंकुर का प्रतीक हूं मैं रेतीली हवाओं में प्राणवायु का निमित्त हूं मैं     कभी-कभी मैं इंसान के भीतर भी उगता हूं जब मन रेगिस्तान होता है प्रेमरूपी जल   का सर्वथा अभाव होता है कांटे बोली में आ जाते हैं व्यवहार चुभने लगता है   पर मत भूलों ऐसे चुभने वालों ने ही संघर्षों ने की धूप को झेला होता है   जब मिले कोई स्वयं के भीतर कैक्टस को पाले तो उसके व्यवहार में खामियां गिनाने से पहले   एक बार इतना जरूर सोचना किसी तपते रेगिस्तान में प्राणवायु का जरिया बना होगा तभी कांटों का चोला इसने पहना होगा