गणित, ज्योतिष गणना और साहित्य का अनूठा संयोग

 आज मनेगा महाकवि कालिदास का जन्मदिवस

संस्कृत के साहित्यकारों पर बात हो तो सर्वप्रथम महाकवि कालिदास का नाम आता है। विश्व के इस महानतम साहित्यकार की कृतियों को समय भी पुराना नहीं कर पाया। विश्व साहित्य में कालजयी कही जाने वाली इन कृतियों के रचियता ने कही भी स्वयं के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा। संस्कृत के विद्वान भी उनकी रचनाओं के आधार पर उनकी जन्मतिथि और जन्मस्थान  के बारे में अनुमान लगाते रहे हैं।

कितनी अद्भुत बात है कि हर क्षेत्र के विद्वानों ने उन्हें अपने क्षेत्र से संबंधित सिद्ध करने का प्रयास किया। काश्मीर के विद्वानों ने कहा कि वे काश्मीर के थे। वहीं उनके ग्रंथों में उज्जैन का जो सुंदर और विस्तृत वर्णन मिलता है, उसे देखकर विद्वानों ने कहा कि वे उज्जैन के थे। कुछ विद्वानों ने उनका जन्मस्थान बंगाल को बताने का भी प्रयास किया।

उनके साहित्य में भगवान महांकाल की आरती, शिप्रा नदी के तट, महांकाल वन, उज्जैन के बाजारों के इतने सुंदर और विस्तारित वर्णन मिलते हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद इस बात पर सहसा यकीन हो जाता है कि उन्होंने जरूर जीवन का लंबा समय उज्जैन में बीताया होगा। इसी आधार पर संस्कृत के विद्वानों और साहित्यकारों में इस बात पर बहुमत बनने लगा कि महाकवि कालिदस उज्जैन के थे।

पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण जी व्यास की पहल पर स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही कालिदास समारोह मनाना प्रारंभ हुआ। अपनी जन्मतिथि के बारे में महाकवि ने कुछ नहीं लिखा लेकिन उनकी रचनाओं में देवप्रबोधनी एकादशी (देवउठनी ग्यारस) का सुंदर वर्णन मिलता है। देवप्रबोधनी एकादशी के प्रति उनके लगाव को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया कि आमतौर पर मनुष्य को अपनी जन्मतिथि से बहुत लगाव होता है। देवप्रबोधनी एकादशी की शुभतिथि पर प्रतिवर्ष कालिदास समारोह मनाया जाने लगा। 1958 से समारोह का आयोजन अखिल भारतीय स्तर पर होने लगा इस समारोह ने देश-प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। 

38 वर्ष पूर्व मेरे बड़े दादाजी और ख्यात ज्योर्तिविद स्वर्गीय पंडित मोरेश्वर जी शास्त्री दीक्षित ने एक शोधपत्र में यह प्रमाणित किया कि महाकवि कालीदास की जन्मतिथि 22 जून है। यह शोधपत्र कालिदास समारोह की शोध संगोष्ठी में पढ़ा गया और किसी भी विद्वान ने इसका खंडन नहीं किया। बीते 38 सालों से 22 जून को भी उज्जैन में कालिदास समारोह मनाया जा रहा है। 

इस बारे में ख्यात साहित्यकार डॉ देवेन्द्र जोशी कहते है कि महान व्यक्तियों को सिर्फ उनके जन्मस्थान या जन्मतिथि पर ही याद क्यों किया जाए, उनके स्मरण में वर्ष में एक या दो ही क्यों इससे ज्यादा समारोह भी मनाए जा सकते हैं। जहां तक सवाल महाकवि कालिदास की जन्मतिथि का है इस बारे में कोई संस्कृत विद्वान पूरी प्रमाणिकता के साथ कोई दावा नहीं कर पाया। ऐसे में उज्जैन के एक विद्वान ज्योतिष स्वर्गीय पंडित मोरेश्वर जी दीक्षित ने महाकवि की जन्मतिथि निर्धारित समाज के सामने प्रस्तुत की। ऐसे विद्वान के श्रम और साहस को प्रणाम तो किया जाना चाहिए। दूसरी ओर देवप्रबोधिनी एकादशी पर महाकवि की जन्मतिथि होने का कोई ठोस आधार नहीं है। दोनों ही मान्यताओं को ना तो प्रथम दृष्टतया खारिज किया जा सकता है, ना ही स्वीकार किया जा सकता है। हम साहित्यजगत के लोगों के लिए यह दोनों समारोह विश्व के महानतम साहित्यकार को याद करने के अवसर की तरह है। दोनों ही समारोह में संस्कृत के  आचार्य, साहित्यकार, प्रशासनिक अधिकारी और राजनेता सम्मिलित होते हैं।  

Comments

Popular posts from this blog

जहां साथ-साथ दिखाई देते हैं गणपति बप्पा और ध्रुव तारा

अंर्तमन को तृप्त करने वाला वीकेंड

The logic behind 56 Bhog Concept