हां, मैं कैक्टस हूं
मैं कैक्टस हूं
कंटीला हूं,
चुभता हूं
पर खड़ा रहता हूं
गर्म हवा के थपेड़ों में
वीरान रेगिस्तानों में
ना हरी पत्तियां
ना फूल
ना फल हैं मेरे पास
ना बहारों का बसेरा
ना तितलियों का डेरा है
फिर भी इस धरा पर
इक खास वजूद मेरा हैं
क्योंकि तपती भूमि पर
नए जीवन का अंकुर का
प्रतीक हूं मैं
रेतीली हवाओं में
प्राणवायु का निमित्त हूं मैं
कभी-कभी मैं
इंसान के भीतर भी
उगता हूं
जब मन रेगिस्तान होता है
प्रेमरूपी जल का
सर्वथा अभाव होता है
कांटे बोली में आ जाते हैं
व्यवहार चुभने लगता है
पर मत भूलों
ऐसे चुभने वालों ने ही
संघर्षों ने की धूप को झेला होता है
जब मिले कोई स्वयं के भीतर
कैक्टस को पाले
तो उसके व्यवहार में
खामियां गिनाने से पहले
एक बार इतना जरूर सोचना
किसी तपते रेगिस्तान में
प्राणवायु का जरिया बना होगा
तभी कांटों का चोला
इसने पहना होगा

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