नर्मी वाली गर्मियां
नर्मी वाली गर्मियां
धरती का पारा चढ़ता है,
तभी कुछ दिलों में,
उमंगों का सैलाब उमड़ता है
नाती-पोते घर आएंगे
सूने आंगन में बहार लाएंगे
हंसी किलकारी घर में गूंजेगी
बातों-बातों में सारी रात बीतेगी
इन दिनों में उमंगों पर भारी
मशीनों का जोर हैं
ठहाकों से ज्यादा
मोबाईल का शोर है
एक वो गर्मियां भी थी
जब आम की मिठास और
कैरी की खटास के बीच
खुलते थे कई हल्के-फुल्के राज
मिलती थी समझाईशे भी
होता था रूठना मनाना भी
कभी होता था खाने का मनुहार
कभी पड़ती थी शरारतों पर फटकार
नानी-दादी के दुखते पैरों पर
नन्हें कदम करते थे कदमताल
टांग भी खींचती थी
आंसू भी गिरते थे
भीगे हुए चेहरे पर
फिर हंसी खिल जाती थी
वो मेरे बचपन की गर्मियां थी
गर्म होने के बावजूद उनमें
प्यार की नरमी थी

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