नौ दिन, नौ नदियां

  

सातवां दिन, सातवीं नदी कावेरी

कहानी ब्रह्मा पुत्री की

आज बात करते हैं, उस नदी की जो स्वर्गलोक में ब्रह्मा की पुत्री थी, भगवान गणेश के हाथों वो एक नदी में तब्दील हो गई और हजारों वर्षों से धरती की प्यास बुझा रही है। ये कहानी है- कावेरी नदी की।

भारत की पवित्र नदियों में से एक कावेरी के जन्म की कई कथाएं धर्मग्रंथों में और जनश्रुतियों में सुनने को मिलती है। भौगोलिक रूप से देखा जाए तो पश्चिम घाट की ब्रह्मगिरी पर्वत श्रृंखला पर तालकावेरी नामक कुंड से कावेरी का जन्म होता है। यहां से तमिलनाडु और कर्नाटक राज्य में 800 किलोमीटर की यात्रा कर कावेरी बंगाल की खाड़ी में समा जाती है।




तमिल साहित्य में कावेरी को पोन्नी नाम से पुकारा गया है, कही-कही इसका जिक्र स्वर्णदासी के नाम से भी हैं। स्वर्णदासी की संज्ञा इसके किनारों पर जमा होने वाली सुनहरी रेत की वजह से दी गई। यह नदी दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु और कर्नाटक के खेतों में सिंचाई का प्रमुख स्रोत है। यहां लोग इसे कावेरी अम्मा के रूप में पूजते हैं।

बहुप्रचलित कथा के मुताबिक ब्रह्माजी की एक पुत्री विष्णुमाया थी, जो पृथ्वी पर आकर मानव सेवा करना चाहती थी। दूसरी ओर दक्षिण भारत के एक नि:संतान राजा कावेर भी ब्रह्मा जी की आराधाना कर संतान सुख मांग रहे थे। ब्रह्मा जी ने विष्णुमाया को कावेर की संतान बनाकर पृथ्वी पर भेज दिया। राजा ने कन्या का नाम लोपामुद्रा रखा, बड़ी होकर लोपामुद्रा एक सुंदर युवती बन गई। एक बार ऋषि अगस्तया की लोपामुद्रा से भेंट हुई तो उन्होंने राजा कावेर के समक्ष लोपामुद्रा से विवाह का प्रस्ताव रखा। कावेर राजी हो गए दूसरी ओर लोपामुद्रा ने उम्र में स्वयं से बड़े वर की ओर से विवाह प्रस्ताव पाकर शर्त रखी कि यदि अगस्तय उसे अकेला छोड़कर दीर्घकालीन प्रवास पर ना जाए, तो वह इस विवाह के लिए सहमत हैं। यदि ऋषि उसे लंबे समय के लिए छोड़कर गए तो वह उन्हें छोड़ देगी। ऋषि ने शर्त स्वीकार कर ली।

वे दोनों ऋषि अगस्तया के आश्रम में रहने लगे। कुछ सालों के बाद दक्षिण भारत के इलाकों में बारिश ना होने की वजह से सूखा पड़ा। परेशान जनता ने भगवान गणेश से संकट दूर करने की अपील की। इसी दौरान ऋषि अगस्तया ने शिष्यों समेत् दीर्घकालीन प्रवास पर जाने की योजना बनाई चूंकि वे लोपामुद्रा को अकेला नहीं छोड सकते थे तो उन्होंने लोपामुद्रा को जल में तब्दील कर अपने कमंडल में रख लिया। रास्ते में विश्राम के दौरान उन्होंने अपना कमंडल वृक्ष पर टांग दिया, उसी समय भगवान गणेश कौएं का रूप धरकर वृक्ष पर पहुंचे और कमंडल का पानी नीचे गिरा दिया, कमंडल से नीचे गिरी जलधारा कावेरी नदी बन गई। राजा कावेर की पुत्री होने की वजह से उसे कावेरी नाम दिया गया।


एक अन्य जनश्रुति के मुताबिक एक बार दक्षिण भारत में भीषण सूखा और अकाल पड़ा। मनुष्य और सभी जीव-जंतु भूख-प्यास से व्याकुल हो उठे। लोगों का दर्द देखकर ऋषि अगस्तया ब्रह्मा जी के पास मदद मांगने पहुंचे। ब्रह्मा जी उनके कमंडल में जल देकर कहा कि यह जल सभी की प्यास बुझाएगा। वापसी के दौरान ऋषि ब्रह्मागिरी पर्वत पर रूककर सुस्ताने लगे और उनकी नींद लग गई। गणेशजी यह पूरा घटनाक्रम देख रहे थे, ऋषि को सोता देख उन्हें लगा कि यदि ऋषि ने लंबी नींद ली तो बहुत देर हो जाएगी और कई जीव-जंतु प्यासे मर जाएंगे। तब उन्होंने कौएं का रूप लेकर कमंडल का पानी नीचे गिरा दिया, धरती को छूते ही पानी विशाल नदी में बदल गया, जिसे कावेरी के नाम से पुकारा गया।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कावेरी धरती पर मानव की प्यास बुझाने के लिए अवतरित हुई। दूसरी ओर इस नदी से ज्यादा पानी लेने की होड़ में तमिलनाडु और कर्नाटक में भारी विवाद हुआ। विवाद सालों तक चला और चलता ही रहा। 1970, 1980 और 90 के दशक में सरकार ने इस विवाद को सुलझाने की बहुत कोशिश की पर विवाद चलता ही रहा। अंतत: 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विवाद को विराम मिला।

 

 

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