जितने नाम, उतनी कथाएं ब्रह्मपुत्र

 नौ दिन, नौ नदियां

आठवां दिन, आठवीं नदी – ब्रह्मपुत्र

नौ दिन, नौ नदियां श्रृंखला के आठवें दिन बात करते हैं ब्रह्मपुत्र की। इसके किनारे फैले हैं - चाय के बागान, इस तरह चाय के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्मपुत्र रोज सुबह हमारे दिन का हिस्सा बन जाता है।

 साफ पानी से लबालब भरा ब्रह्मपुत्र तिब्बत से बहते हुए भारत और भारत से बांग्लादेश पहुंच जाता है, जी हां, पहुंच जाता है क्योंकि पौराणिक संदर्भों में यह नदी नहीं नद है। यह ब्रह्मा का पुत्र है। भारत की तमाम नदियों को पौराणिक संदर्भों में स्त्री रूप में चित्रित किया गया है। ब्रह्मपुत्र और सोनभद्र पुरूष रूप में वर्णित है इसलिए अंग्रेजी भाषा और विश्वपटल पर ये रिवर है लेकिन भारतीय समुदाय में ये नद है।



इसके कई नाम हैं और हर नाम के साथ एक कहानी जुड़ी है। इसका उद्गम हिमालय के उत्तर में तिब्बत के पुरंग जिले में मानसरोवर झील के निकट से होता है। तिब्बत में इसे यारलुंग सांपो कहते हैं। अरूणाचल प्रदेश में सियांग और धियांग, असम में ब्रह्मपुत्र, बंग्लादेश में यमुना के नाम से पुकारा जाता है। ब्रह्मपुत्र का बांग्लादेश में गंगा से संगम होता है। बांग्लादेश में गंगा को पद्मा और ब्रह्मपुत्र को यमुना या यबुना पुकारा जाता है। दोनों के संगम के बाद इन्हें सम्मिलित रूप मेघना कहते हैं और मेघना अंतत: सुंदर वन के रूप में दुनिया का सबसे खूबसूरत डेल्टा बनाते हुए सागर में समा जाती हैं।

ब्रह्मपुत्र के बारे में हिंदू पौराणिक  कथा के अनुसार पूर्व में यह नद ऊंची पहाडियों के बीच बसा ब्रह्मकुंड था। परशुराम ने जब अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता का वध कर दिया था, तब मातृवध के पाप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें ब्रह्मकुंड में स्नान करने की सलाह दी गई। परशुराम ने स्नान करने के बाद ब्रह्मकुंड के सामने की एक पहाडी को भाले से काट दिया ताकि कुंड का पानी नीचे बहे और लोगों की प्यास बुझाए। इस तरह जो जलधारा नीचे की ओर बही उसे बह्मपुत्र कहा गया क्योंकि वह ब्रह्मकुंड से पैदा हुई थी। बौद्धधर्म की दंतकथाओं में भी इसी तरह  के वर्णन मिलते हैं जिसके अनुसार जनकल्याण के लिए एक बौद्धभिक्षुक ने पहाडी काटकर ब्रह्मपुत्र को आगे बढ़ने का अवसर दिया।



ब्रह्मपुत्र की विशाल जलराशि और तेज प्रवाह समूचे विश्व के लिए आश्चर्य और आकर्षण का केंद्र है। ब्रह्मपुत्र के किनारों पर मृदा कटाव बहुत अधिक होता है, जो उसके ईर्द-गिर्द बसे समुदाय के लिए कभी-कभी कठिनाईयां बढ़ा देता है। अकसर ब्रह्मपुत्र में बाढ़ की स्थिति भी निर्मित हो जाती है। इसके जल को तिब्बत, भारत और बांग्लादेश तीनों इस्तेमाल करते हैं। ब्रह्मपुत्र के किनारे ही चाय के खूबसूरत बागान बसे हैं। चाय, जिसकी चुस्कियों से हर सुबह करोड़ों भारतीय नींद अपने दिन की शुरूआत करते हैं। 

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