सकल कलुष निवारणी गंगे
नौ दिन नौ नदियां
नौवां
दिन, नौवीं नदी गंगा
नौ दिन, नौ नदियां में नौवें दिन जानिए गंगा के बारे में: गंगा का नाम लेते ही जहन में तस्वीर उभरती हैं कलरव करती बहती धारा और उसमें आचमन करते लोगों की। हिमालय से उतरकर बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ते हुए गंगा दुनिया के सबसे ऊपजाऊ मैदानों को सिंचती हुई, असंख्य जीवों की प्यास को तृप्त करती हुई आगे बढ़ती है। गंगा के नाम पर कई कीर्तिमान हैं मसलन दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा गंगा नदी बनाती है। ऋग्वेद में गंगा का जिक्र हैं, महाभारत में गंगा का वर्णन हैं, रामायण में श्रीराम का केवट की नाव पर सवार होकर गंगा नदी पार करने के प्रसंग का उल्लेख हैं।
अपने
उदगम से सागर मिलन तक गंगा 2500 किलोमीटर का मार्ग तय करती हैं। इस पापमोचनी, मोक्षदायिनी
नदी से हम सचमुच अपनी मां की तरह प्रेम करते हैं। जिस तरह मां से बहुत प्रेम करने के
बावजूद शायद हम अपनी मां का उतना ख्याल नहीं रख पाते, जितना रखना चाहिए था। बस वैसा
ही कुछ गंगा के साथ भी हैं, हम इससे प्रेम बहुत करते हैं पर यह प्रेम हमारी भावना,
आस्था और स्मृतियों तक सीमित रह जाता हैं। हमारी मां हमसे क्या चाह रही हैं, आमतौर
पर हम समझ नहीं पाते और मां बोलती नहीं।
गंगा
के पानी को स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है, प्राचिन काल में माना जाता था कि इसका पानी
पी लेने से बीमारियां दूर रहती है। दरअसल इसके पानी में बैक्टीरियोफैज नामक सूक्ष्मजीव
प्राकृतिक रूप से मौजूद रहता हैं, इस सूक्ष्मजीव की 19 प्रजातियां अब तक गंगा में पहचानी
जा चुकी हैं। यह जीव आंखों से नजर नहीं आता। इसका भोजन होते हैं बैक्टिरिया और वायरस।
गंगा जल के माध्यम से जब यह हमारे शरीर में पहुंचता था, तब शरीर के भीतर मौजूद वायरस
और बैक्टीरिया का भक्षण कर लेता था। यही कारण था कि बीमार लोगों को गंगाजल पी लेने
की सलाह दी जाती थी और गंगा जल और गंगास्नान से वाकई लोगों की कई शारीरीक परेशानियां
खत्म हो जाती थी।
आज
गंगा के उद्गम से लेकर बांग्लादेश में उसके अंतिम बिंदु तक मानव का हस्तक्षेप बढ़ता
ही जा रहा है जिसका असर कही ना कही नदी पर हो रहा हैं। नदी हमारी हैं और उसके सान्निध्य
में जाने का पूरा हक हम सभी को हैं। उसके सान्निध्य में जाकर हमें क्या करना हैं? और
क्या नहीं करना हैं? इस बारे में सोचना, समझना और सही कदम उठाना बहुत जरूरी हैं, वरना
हम उन नादान बच्चों की तरह गलतियां कर बैठेंग जो गलति से कभी-कभी अपनी मां को ही चोट
पहुंचा देते हैं ध्यान रखे कि गंगा मां के करोड़ों बच्चे अगर अनजाने में ही सही अगर
यह गलतियां दोहराते रहेंगे तो अंतत: गंगा मां का क्या हाल होगा? नेपाली संस्कृति में
गंगा को जल की संरक्षिका देवी माना जाता है। थाई संस्कृति में गंगा को क्राथोंग कहा
गया है और गंगाजल को पवित्र जल की संज्ञा दी गई है। थाईलैंड में स्थित चार पवित्र सरोवरों
का जल जब वहां के स्थानीय रीति रिवाजों के अनुसार जब किसी पूजा में इस्तेमाल किया जाता
है तो पहले उस जल में गंगाजल मिलाया जाता है। राजघराने से संबंधित रस्मों में इसका
विशेष ख्याल रखा जाता है। मॉरिशस में बसे प्रवासी भारतीयों ने वहां एक तालाब बनाया
है, जिसे नाम दिया है- गंगातालाब। इस कुंड में स्थानीय स्रोतों से प्राप्त जल एकत्रित
करने के बाद वहां के प्रधानमंत्री ने गौमुख से गंगाजल लाकर मिला दिया था। इस तरह गंगाजल
मिल जाने से गंगाकुंड वहां के लोगों की आस्था का केंद्र बन गया। कंबोडिया और बाली की
संस्कृति में भी गंगा को पूजनीय माना गया है।

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