शिवत्व और संघर्षों का विष




आदिदेव शंकर ब्रह्मांड के मूल आधार है। जब संसार में कुछ नहीं था, तब भी शिव थे और जब संसार में कुछ नहीं रहेगा, तब भी शिव रहेंगे। ऊंचे पर्वतों के शिखरों पर, बर्फिले दर्रों पर, गहरी नदियों के तल में, धरती से क्षितिज तक फैले रेगिस्तान समेत घने जंगलों की ओट में छुपी गुफाओं में हर ओर शिव का वास है। कहते हैं कि शिव-शंकर भोले-भंडारी है, बड़ी आसानी से भक्तों पर प्रसन्न हो जाते है और मांगने पर मनचाहा वर दे देते हैं।

सचमुच कितने भोले है प्रभु। जहां बैठा दो, वहीं का नाम धर लेते हैं। आसानी से मिल जाने वाले बैर, धतूरा, आंकडा, बिल्व स्वीकार कर लेते हैं। यूं तो शिव के नाम पर संस्कृत के क्लिष्ट स्रोत है, पर जटिल आराधना में दिक्कत हो तो शिवम्-शिवम् के नाम से प्रसन्न हो जाते हैं। एक ओर वे  इतने सहज और सरल है, वहीं दूसरी ओर संसार को बचाने के लिए विष को अपने कंठ में धर लेते हैं, बिना किसी अपेक्षा के।

भगवान शंकर से जुडी अनगिनत कहानियों को मैं बचपन से सुनती रही हूं। कभी-कभी मुझे लगता है कि इन कहानियों के नायक भगवान शिव के कुछ अंश हमारे आस-पास ही हैं। बिना जटाओं के, बिना भभूत और बिना त्रिशूल के। हमारे ईर्द- गिर्द कितने ही लोग है, जिन्होंने कठिन संघर्षों का विष अकेले ही पी लिया ताकि परिवार को आरामदायक जिंदगी मिले।

मेरी मां भी शिवभक्त थी और उनके आराध्य देव की तरह भोली भी। मम्मी ने  भी तो संघर्षों का विष पीया और पीकर गले में ही रख लिया। उनके संघर्ष ना उनके दिल को कठोर बना पाए, ना जुबां को कडवा कर सके। उन्हें शिव की सिर्फ पूजा नहीं की, बहुत हद तक शिवत्व को अंगीकार भी किया। हमारे बड़े क्या है? उन्होंने क्या कर दिया? क्या सह लिया? अकसर इसका एहसास तभी होता है जब वो सशरीर हमारे बीच में नहीं होते। 

इन दिनों एक उम्रदराज आंटी से अकसर मुलाकात हो जाती है। सारी उम्र उन्होंने मुंबई की लोकल ट्रेन में धक्के खाते हुए अपनी नौकरी, घर और बच्चों को अकेले संभाला। लोकल ट्रेन की भागमभाग के बीच आंटी ने सुकूनभरे बुढ़ापे के सपने बुने। अब फिर अपने सपनों को अधूरा छोड़ बेटे और पोते के सपनों में रंग भरने के लिए दुबई में रहती है। सुबह से शाम तक भागमभाग में जुटी रहती है। जीवन भर की जोड़-तोड़ के बाद उन्होंने जो कुछ जोड़ा, अब बहू के डॉलर और बेटे के दिरहम के सामने रूपये की तरह कमजोर पड़ गया। 


आंटी के संघर्षों की बुनियाद पर खड़ी इमारत कुछ सालों में ही हाउसिंग बोर्ड के मकान की तरह छोटी पड़ गई पर उन्हें कोई मलाल नहीं है। इसके उलट कशमकश है
, कि कैसे बेटे और पोते की जिंदगी को आसान बना दिया जाए। जीवन की ढलान पर खड़ी आंटी केक और कुकीज बनाना सिखती हैं, ब्रिटिश स्कूलों के सिलेबस को पढ़ती हैं ताकि अब नई जिम्मेदारियों के सांचे में खुद को ढ़ाल सके।

इन सबके बीच उन दोस्तों का साथ छूट गया, जो सुख-दुख में साथ निभाते थे, वो घर भी पीछे छूट गया, जिसकी एक-एक ईंट कड़ी मेहनत की कमाई से जुटाई थी। इस दर्द को वो वैसे ही गले में रख लेती है, जैसे शिव ने विष को रखा है क्योंकि दुख यदि अंदर उतर जाए तो जीवन को नकारात्मकता की ओर धकेल देता हैं और गले से बाहर निकलने लगे तो पहले जुबां और बाद में रिश्तों में कड़वाहट घोलता है। मुझे उन आंटी में भी शिव का अंश नजर आता है।

आप भी देखिए, शायद शिव का कोई अंश आपके ईर्द-गिर्द भी जिंदगी की विपदाओं की धार को अपनी जटाओं में समेट कर मद्धम करने का प्रयास कर रहा हो, ताकि उन लोगों का जीवन आसान बना सके, जिनसे वो प्यार करता है।

 

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