हां, मैं एक लड़की हूं
हां, मैं एक लड़की हूं
हां, मैं एक लडकी हूं
साधारण हूं,
छोटे शहर से
मध्यमवर्गीय घर से हूं,
हां मैं एक लड़की हूं
मैं उत्साह हूं
उमंग हूं
तरंग हूं
मिठास हूं
मैं शब्द और भाव हूं
मैं रस और काव्य हूं
पर तुम्हें मुझमें दिखता सिर्फ
एक छोटा घर और पुराना मोहल्ला है
सरकारी स्कूल और स्टेट बोर्ड की पढ़ाई
का ठप्पा है
तुम्हारी आंखे क्यों मेरी मार्कशीट के
अंक नहीं पढ़ सकी
क्यों मेरे मैडल की चमक नहीं सराह सकी
दरअसल दोष तुम्हारा नहीं
उस सोच का था
जिस पर धनसंपत्ति और दौलत का पहरा था
पर तुम्हारी सोच से मुझे अब पड़ता कोई
फर्क नहीं
अच्छा हुआ कि दौलत का तराजू तुम्हारा
है,
मेरा नहीं
हुआ यूं कि स्कूल के ब्लैकबोर्ड ने दुनिया
देखने की खिड़की दिखा दी
उस खिड़की ने मुझे उजालों का पता बता
दिया
थोड़ी हिम्मत कर मैंने खिड़की से कूदकर
देखा
तो अपने सामने खुला दरवाजा पाया
दरवाजा जो पार किया
तो नया जहान मिल गया
जहां लड़के और लड़कियों को उनके कौशल से
आंका जाता है
जहां घर की संपत्ति नहीं दिमागी समृद्धि
को तौला जाता है
जहां स्कूल के नाम को नहीं इंसान के
हुनर को परखा जाता है
काश, तुम देख पाते कि ये दुनिया की कितनी बड़ी है
ये क्या तुम्हारी सोच अब तक झूठे अहंकार
पर अड़ी है
खैर, तुम अपने दायरों और तराजूओं को संभालों
मुझे खिड़कियों और दरवाजों का पता,
पता है
मैं खोलती रहूंगी,
आना-जाना लगातार करती रहूंगी
और बाकियों को भी इन दरवाजों का पता
बताती रहूंगी।
फिर हम मिलकर बनाएंगे और भी दरवाजें
जो खुलेंगे उजालों की दुनिया में
तुम्हें पता ही होगा ना कि एक दरवाजे
से
पूरा पहाड़ बाहर निकल आता है और
एक सुराख से पूरी नाव डूब जाती है।
हमें नाव के डुबने से कोई लेना-देना नहीं
बस पहाड़ों को तोड़ना है जो बने है
अहम, वहम और अकड़ से…

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