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Showing posts from 2023

हैप्पी बर्थडे माही

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  आज भारत के सबसे सफलतम क्रिकेट कप्तान का जन्मदिन है। किसी इंसान के प्रति दीवानगी क्या होती है? कोई किस कदर किसी के दिल पर राज कर सकता है? इसकी सीमा देखनी हो तो किसी धोनी प्रशंसक से मिलिए और धोनी के नाम का जिक्र भर छोड़ दीजिए, फिर देखिए कि दिलों पर राज कैसा होता है? मैं 2021 में दुबई में एशिया कप कवर कर रही थी, कवरेज के दौरान एक पाकिस्तानी फैन ने अपने इंटरव्यू में कहा कि पाकिस्तानी टीम के पास एक ही कमी है, कि पाकिस्तान के पास महेंद्र सिंह धोनी नहीं है। क्या कमाल जादूगरी है, कि जब दो देशों में अहम की टक्कर अपने चरम पर होती है, तब भी एक क्रिकेट फैन के दिल से धोनी बाहर नहीं निकल पाता। सफेद दाढ़ी, सांवला रंग और मोहक मुस्कान वाले धोनी अपने काम में कितने माहिर है, ये सब जानते हैं। मुझे धोनी में एक क्रिकेटर से ज्यादा एक चमत्कार की तरह लगता है। ऐसा चमत्कार जिसकी उम्मीद हम सब करते हैं पर भरोसा बहुत कम। हम सब सफल होना चाहते हैं, बाहर भी और अंदर भी। कितनी अजीब बात है कि जब बाहर सफल होने लगते हैं, भीतर से कुछ हारने लगते हैं, कुछ खोने लगते हैं। जब अंदर झांकते हैं,भीतरी बातों को संवारने की ...

गणित, ज्योतिष गणना और साहित्य का अनूठा संयोग

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  आज मनेगा महाकवि कालिदास का जन्मदिवस संस्कृत के साहित्यकारों पर बात हो तो सर्वप्रथम महाकवि कालिदास का नाम आता है। विश्व के इस महानतम साहित्यकार की कृतियों को समय भी पुराना नहीं कर पाया। विश्व साहित्य में कालजयी कही जाने वाली इन कृतियों के रचियता ने कही भी स्वयं के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा। संस्कृत के विद्वान भी उनकी रचनाओं के आधार पर उनकी जन्मतिथि और जन्मस्थान   के बारे में अनुमान लगाते रहे हैं। कितनी अद्भुत बात है कि हर क्षेत्र के विद्वानों ने उन्हें अपने क्षेत्र से संबंधित सिद्ध करने का प्रयास किया। काश्मीर के विद्वानों ने कहा कि वे काश्मीर के थे। वहीं उनके ग्रंथों में उज्जैन का जो सुंदर और विस्तृत वर्णन मिलता है, उसे देखकर विद्वानों ने कहा कि वे उज्जैन के थे। कुछ विद्वानों ने उनका जन्मस्थान बंगाल को बताने का भी प्रयास किया। उनके साहित्य में भगवान महांकाल की आरती, शिप्रा नदी के तट, महांकाल वन, उज्जैन के बाजारों के इतने सुंदर और विस्तारित वर्णन मिलते हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद इस बात पर सहसा यकीन हो जाता है कि उन्होंने जरूर जीवन का लंबा समय उज्जैन में बीताया होगा। इसी...

नर्मी वाली गर्मियां

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  नर्मी वाली गर्मियां जब सूरज आग उगलता हैं, धरती का पारा चढ़ता है, तभी कुछ दिलों में, उमंगों का सैलाब उमड़ता है   नाती-पोते घर आएंगे सूने आंगन में बहार लाएंगे हंसी किलकारी घर में गूंजेगी बातों-बातों में सारी रात बीतेगी   इन दिनों में उमंगों पर भारी मशीनों का जोर हैं ठहाकों से ज्यादा मोबाईल का शोर है   एक वो गर्मियां भी थी जब आम की मिठास और कैरी की खटास के बीच खुलते थे कई हल्के-फुल्के राज   मिलती थी समझाईशे भी होता था रूठना मनाना भी   कभी होता था खाने का मनुहार कभी पड़ती थी शरारतों पर फटकार नानी-दादी के दुखते पैरों पर नन्हें कदम करते थे कदमताल टांग भी खींचती थी आंसू भी गिरते थे भीगे हुए चेहरे पर फिर हंसी खिल जाती थी   वो मेरे बचपन की गर्मियां थी गर्म होने के बावजूद उनमें प्यार की नरमी थी

हां, मैं कैक्टस हूं

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         मैं कैक्टस हूं कंटीला हूं, चुभता हूं पर खड़ा रहता हूं   गर्म हवा के थपेड़ों में वीरान रेगिस्तानों में   ना हरी पत्तियां ना फूल ना फल हैं मेरे पास ना बहारों का बसेरा ना तितलियों का डेरा है फिर भी इस धरा पर इक खास वजूद मेरा हैं   क्योंकि तपती भूमि पर नए जीवन का अंकुर का प्रतीक हूं मैं रेतीली हवाओं में प्राणवायु का निमित्त हूं मैं     कभी-कभी मैं इंसान के भीतर भी उगता हूं जब मन रेगिस्तान होता है प्रेमरूपी जल   का सर्वथा अभाव होता है कांटे बोली में आ जाते हैं व्यवहार चुभने लगता है   पर मत भूलों ऐसे चुभने वालों ने ही संघर्षों ने की धूप को झेला होता है   जब मिले कोई स्वयं के भीतर कैक्टस को पाले तो उसके व्यवहार में खामियां गिनाने से पहले   एक बार इतना जरूर सोचना किसी तपते रेगिस्तान में प्राणवायु का जरिया बना होगा तभी कांटों का चोला इसने पहना होगा

एक दुआ खुद के लिए

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  चलो इस रमादान   कुछ ऐसा करते हैं                            एक दुआ खुद के लिए करते हैं। खामियों को अपनी थोड़ा नजरअंदाज करते हैं खूबियों को जरा कसकर पकड़ते हैं चलो इस बार कुछ ऐसा करते हैं एक दुआ खुद के लिए करते हैं   ठहरकर थोड़ी देर आस - पास नजर घुमाते हैं कितना कुछ बिखरा है चारो ओर धीरे - धीरे सब समेटते हैं कुछ बातों को यादों की अलमारी में कुछ किस्सों को हौसलों की गुल्लक में   अच्छी तरह से सहेज लेते हैं चलो इस रमादान कुछ ऐसा करते हैं एक दुआ खुद के लिए करते हैं   भूरी चिड़ियां , सुनहरी बिल्ली , काला कबूतर गुलाबी आसमान , सुनहरी रेत , नीला समंदर मखमली घास पर सिरचढ़ा खजूर सुर्ख गुलाब के नीचे हरे - हरे कांटे इन रंगों को आंखों में अपनी भरते हैं चलो इस रमादान कुछ ऐसा करते हैं एक दुआ खुद के लिए करते हैं   रेत के महलों को गढ़कर गुडियां के घर में झांककर खिलौने की ट्रेन का ट्रैक नया बनाते हैं छोटी - छोटी खुशियों से मन का बैंक अकाउंट भरते हैं चलो ...

मजबूती का दूसरा नाम- मां

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  मां के संघर्ष की अनूठी दास्तान      फिल्म संवाद का सबसे सशक्त माध्यम मानी जाती है। जब लेखक , संगीतकार , अभिनेता और निर्देशक अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं तो एक बेहतरीन फिल्म पर्दे पर उभरती हैं और सिनेमाघर के   अंधेरे में दर्शक का दिल और दिमाग सीधे उस फिल्म के घटनाक्रमों से जुड़ जाता है , किरदारों के भाव उसके मन को छूने लगते हैं , उनका दुख पलकें भीगा देता और विषम परिस्थितियों में हासिल की गई जीत दर्शक के मनोबल को बढ़ा देती है। बहुत समय बाद एक ऐसी ही फिल्म देखी जिसने पलकों को भिगोया भी और हॉल से निकलते वक्त आत्मविश्वास और स्वाभिमान को बढ़ाया भी। फिल्म थी - मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे।   एक भारतीय औरत का एक देश के खिलाफ संघर्ष। फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है और फिल्मांकन भी बहुत कसा हुआ और काफी हद तक वास्तविकता के करीब है। बंगाल की एक सीधी सरल लड़की अपनी गृहस्थी बसाने पति के साथ नार्वे पहुंच जाती है और तीन , साढ़े तीन ...