नौ दिन, नौ नदियां


        कहानी काली, धौली और गोरी गंगा की

कहते हैं कि दुनिया की सबसे हुनरमंद कलाकार प्रकृति हैं। वह इंजीनियरिंग भी जानती है और चिकित्सा भी। प्रबंधन की भी विशेषज्ञ हैं और ललित कलाओं की भी।  प्रकृति की नायाब इंजीनियरिंग का एक उदाहरण हैं, भारत के नदीतंत्र। छोटी, छोटी जलधाराएं मिलकर जो विशाल नदीतंत्र भारत में बनाती हैं, वैसा दुनिया में कही और मिलना मुश्किल हैं। नवरात्री का वक्त हैं और नदियां भी हमारे लिए देवीतुल्य और मातृतुल्य पूजनीय हैं। तो चलिए शक्ति की आराधना के अवसर पर जानते हैं, हमें जीवन शक्ति देने वाली कुछ नदियों के बारे में, जो बहते हुए, एक-दूसरे में समाती हैं और एक विशाल नदी को पूर्णता प्रदान करती हैं।

 इंसान और पशुओं की प्यास बुझाती हैं, खेतों को पानी से तृप्त करती है और धरती को सुदंर बनाती है। आज पहले दिन आईए जानते हैं कालीगंगा के बारे में


   

 कालीगंगा, गंगा की उपसहायक नदियों में से एक हैं। उपसहायक नदी की सहायक नदियों में शामिल कई अन्य नदियों में दो के नाम बहुत दिलचस्प हैं- गोरी गंगा और धौली गंगा।

कालीगंगा को काली, महाकाली और शारदा नदी के नाम से जाना जाता है। इसका उद्गम उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की सीमाओं के अंतर्गत आने वाली हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं में 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालापानी नामक स्थान से होता है। यह भारत और नेपाल के बीच एक सीमारेखा बनाते हुए बहती है। जहां-जहां से यह गुजरती है, वहां के स्थानीय लोग इसे अलग-अलग नाम से पुकारते हैं। तवाघाट नामक स्थान पर धौलीगंगा नदी आकर काली गंगा में समा जाती है। धौलीगंगा चीन की सीमा के नजदीक भारत-तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में डवे नामक स्थान से निकलती है। धौली को अपने में सामहित करने के बाद कालीगंगा आगे का रास्ता तय करती है। आगे धारचूला नगर से निकलने के बाद जौलजीबी नामक स्थान पर गोरी गंगा और काली गंगा का संगम होता है। काली और गोरी नदी का संगम होने से पूर्व गोरी नदी में तकरीबन दस पहाड़ी जलधाराएं आकर मिल जाती है।  इसके बाद नेपाल से बहकर आने वाली चमेलिया नदी इसमें आकर समा जाती है। इसके आगे इसे शारदा नदी के नाम से जाना जाता है। यहां से आगे जाने के बाद दो अन्य नदियां कालीगंगा में समा जाती है। इसके बाद यह शिवालिक की तराई में बसे सपाट मैदानों से होते हुए उत्तरप्रदेश में तकरीबन 100 किलोमीटर बहने के बाद घाघरा नदी में मिल जाती है। अपनी यात्रा पूरी करने के बाद घाघरा भी गंगा में समा जाती है।

 उत्तराखंड की इन नदियों के उदगम से लेकर इनके संगम स्थल तक का मानचित्र और एटलस, आईआईटी कानपुर के नेतृत्व में सक्रिय सेंटर फॉर गंगा बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज की टीम ने तैयार किया है। आज जब हमारे देश से कई नदियां लुप्त हो रही हैं और कुछ लुप्त हो चुकी हैं। ऐसे में नदियों को चिन्हित करने वाला यह दस्तावेज, नदियों के संरक्षण में काम करने वाली संस्थाओं और प्रशासन के लिए बहुत मददगार साबित होगा।   यह हमारे भौगोलिक विशिष्टताओं को सहेजने वाले नायाब दस्तावेज हैं, आज जब हम कई नदियों के उदगम के बारे में नहीं जानते ऐसे में कडी मेहनत से तैयार यह एटलस भविष्य में जलसंरक्षण और नदी संरक्षण के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा।     

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