नौ दिन, नौ नदियां

 

एक शापित नदी, जिसके श्राप ने रखा उसे स्वच्छ

नौ दिन, नौ नदियां में आज बात एक शापित नदी की, ऐसी नदी जिसे द्वापर युग में द्रौपदी ने श्राप दिया था। कलयुग में यही श्राप नदी का रक्षक बन गया, लोगों ने नदी से दूरी बनाकर रखी नतीजतन आज इस नदी का एक बड़ा हिस्सा प्रदूषण से मुक्त हैं और जलीय जंतुओं के आवास के लिए पूरी तरह अनुकूलित भी। यह कहानी है- चंबल नदी की।

मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में स्थित जानापाव की पहाड़ी से सात नदियों का उद्भव हुआ हैं- इन्हीं सात नदियों में से एक हैं- चंबल। अपनी छह बहनों के साथ जन्म लेने के बाद चंबल लंबा सफर तय कर के यमुना में मिल जाती है। यह गंगा बेसिन की महत्वपूर्ण नदियों में से एक हैं। जानापाव से चंबल का प्रारंभ होना हमारे जमाने का भौगोलिक सत्य है किंतु इसके जन्म के संबंध में कुछ अजीब सी कथाएं भी प्रचलित हैं। इस नदी का जिक्र महाभारत, श्रीमद् भागवत और कालिदास के मेघदूत में भी हैं।


एक कथा के मुताबिक रंतिदेव नामक राजा ने विशाल यज्ञ करवाया था, जिसमें कई पशुओं को अग्निहोत्र को समर्पित किया गया, उन्हीं पशओं की त्वचा की नमी से एक नदी उत्पन्न हुई, जिसे चर्मावती कहा गया। कालिदास रचित महाकाव्य मेघदूत में भी चर्मावती और रंतिदेव का वर्णन है। श्रीमद् भागवत में भी गंभीर और चंबल का उल्लेख हैं। चर्मावती का अपभ्रंश ही कालांतर में चंबल बन गया ।

एक जनश्रुति के अनुसार चंबल का इलाका शकुनि के राज्य का हिस्सा था, पांडवों और कौरवों के मध्य चौसर के खेल का आयोजन भी चंबल के नजदीक ही हुआ था, लिहाजा चीरहरण से अपमानित होने के बाद द्रौपदी ने स्त्री के अपमान के बावजूद मौन रहने की वजह से चंबल नदी को श्राप दे दिया कि जो भी इस नदी का पानी पीएगा, उसके प्रतिशोध की प्यास अतृप्त रहेगी। अभिशप्त चंबल को लोकजीवन में देवी का दर्जा नहीं मिला। आधुनिक काल में चंबल के बीहड़ों में डकैतों का आतंक रहा, डकैतों की मौजूदगी और भय के चलते चंबल के ईर्द-गिर्द उद्योगों और पर्यटन स्थलों के पैर नहीं जम सके। अपने अकेलेपन में चंबल बाहरी दुनिया की उन तमाम गतिविधियों से बच गई, जिनके चलते नदियां प्रदूषित हो जाती है। कह सकते हैं कि त्रेतायुग में दिया गया श्राप, कलयुग में नदी का रक्षक बन गया।

आज चंबल के आंचल में मगर और घडियालों की सुरक्षित बस्तियां बसी हैं, 8 प्रजाति के कछुएं यहां शांति से जीवन-यापन कर रहे हैं। प्रवासी पक्षी इसके आंचल में पनाह लेने आते हैं। नदी में रिवर-डॉल्फिन के मोहल्ले भी हैं और सारस-क्रेन भी इसके ईर्द-गिर्द शिकार की जुगाड़ में घुमते हुए नजर आ जाते हैं।

भले ही चंबल कहानी-किस्सों में अभिशप्त हो लेकिन इसी का पानी राजस्थान के खेतों की प्यास बुझाता है, इसी के हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट से पैदा हुई बिजली राजस्थान के उद्योगों को ऊर्जा की आपूर्ति करती है। चंबल में मोक्षदायिनी क्षिप्रा का संगम होता है, क्षिप्रा के साथ ही गंभीर, कालीसिंध, छोटी कालीसिंध, बनास, पाहुज जैसी सहायक नदियां चंबल को समृद्ध बनाती हैं। अपनी तरल समृद्धता के साथ चंबल का यमुना में मिलन हो जाता है।

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