नौ दिन, नौ नदियां
नदी जिसने खोया था नाम और पहचान
कान्ह नदी
नौ दिन, नौ नदियां में आज बात करते हैं, उस नदी के
बारे में जिसका नाम अंग्रेजी जुबां की गलती से बदल गया और बदला तो ऐसा बदला कि उसके
अपने भी उसका सही नाम भूल गए। बहरहाल नाम क्या गया, नदी की पहचान ही धीरे-धीरे गुम
हो गई। कहते हैं कि सबका वक्त आता है, इसका वक्त भी आया, नाम दोबारा मिला और पहचान
फिर जिंदा हुई और ऐसे जिंदा हुई कि देश के सामने एक उदाहरण कायम हो गया। हम बात कर
रहे हैं इंदौर कि कान्ह नदी की।
हर इंदौरी जानता है कि एक समय था, जब नदी नाले में
बदल चुकी थी और उसका नाम कान्ह से खान हो गया था। दरअसल अंग्रेजी शासन के दौरान अंग्रेजो
को कान्ह शब्द शुद्धता से बोलना नहीं आता था लिहाजा उनके मुंह से कान्ह, खान बन गई।
जो बोला वहीं दस्तावेजों में दर्ज कर दिया। धीरे-धीरे समय बदला। औद्योगिकरण, शहरीकरण,
विकास की नई-नई अवधारणाओं ने मालवा की जमीन पर पैर रखा। हर एक ने अपना अपशिष्ट कान्ह
के किनारों तक पहुंचा दिया। कचरा और अपशिष्ट धीरे-धीरे उसकी पहचान बन गया।
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| गंदे नाले में तब्दील कान्ह |
मुझे अच्छे से याद है कि स्कूल में जनरल नॉलेज की
कक्षा में हमने कान्ह का नाम खान ही सीखा था और जब से होश संभाला इसे नदी कम, नाला
ही देखा। अपने ही शहर में कभी इस नदी के करीब नहीं गई। पत्रकारिता के दौरान ‘बचाओ अपनी
खान’ नाम से एक अभियान में खूब काम किया। मुझे याद है कि उन दिनों एक पार्षद ने इंटरव्यू
के दौरान कह दिया था कि इसे खत्म कर देना चाहिए और जहां-जहां से यह बहती हैं, वहां
अर्बन फॉरेस्ट विकसित किया जाना चाहिए। मेरी अपनी बिरादरी के लोग कभी-कभी तंज कसते
थे, क्या फालतू कैम्पेन पर काम कर रही हो, कोई एक्सक्लूसिव खबर लाओ। बहरहाल हमने खूब
ईमानदारी से काम किया, शहर के लोग साथ जुड़े, सामाजिक संस्थाएं, स्कूल, कॉलेज, एनएसएस
के बच्चे साथ आए। इसी अभियान के दौरान एक वरिष्ठ सज्जन ने नदी का असल नाम बताया और
तर्क रखा कि काम कर ही रहे हो तो पहले नाम सही लिखो। शायद 2013 की बात रही होगी। अभ्यास
मंड़ल ने अभियान के समर्थन में रैली निकाली, दीपावली पर घाट पर दिये जलाए। अभियान लंबा
चला पर एक दिन खत्म हो गया।
2014 में मैंने पत्रकारिता और इंदौर दोनों से विदा ले ली। 2015 में केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी परियोजना में इंदौर शहर को शामिल किया और यहां से शुरू हुआ कान्ह का पुनर्जीवन। आज कान्ह फिर बह रही हैं, बहती हुई कान्ह ने इंदौर को देश के पहला वाटर सरप्लस शहर बना दिया।
कान्ह का जिंदा होना एक मिसाल है कि कोशिश की जाए
तो असंभव कुछ नहीं। कान्ह का जिंदा होना गंगा की निर्मलता का रास्ता भी दिखाता है,
इंदौर से बहकर कान्ह पहुंचती है उज्जैन और मिल जाती है क्षिप्रा में। क्षिप्रा जी समाती
है चंबल में। चंबल जा मिलती है यमुना से और यमुना गंगा से। यह प्रकृति का बनाया तंत्र
हैं। एक शहर की एक नदी जब गंदे नाले में बदलती है तो सोचिए कई शहरों, कस्बों से गांवो
से निकलने वाली छोटी नदियां जब यमुना और गंगा में जा मिलती होगी तो गंगा और यमुना का
क्या हाल बनाती होगी? हम पुण्य कमाने गंगा किनारे जाना चाहते हैं लेकिन अपने करीब से
गुजरने वाली छोटी सी नदी के प्रति हमेशा उदासीन होते हैं। जिस दिन हम अपने करीब की
नदी को नदी का मान देंगे, उस दिन से गंगा की आधी से ज्यादा समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।
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| पुनर्जीवित हो चुकी कान्ह |
मेरे ज्यादातर दोस्त जानते ही हैं कि मैं इंदौरी
हूं। अगर आप इंदौर से सिर्फ पोहे और सेंव बनाने का तरीका ही जानना चाहते हैं तो थोड़ा
ठीक से देखिए, हमारे पास ऐसा बहुत कुछ हैं जो आप हम से सीख सकते हैं। उसमें एक हैं
हमारी जिद और साथ निभाने की हमारी आदत। बहरहाल इंदौर की तरह उत्तरप्रदेश में नदियों
को जिंदा करने की कोशिश जारी है- जहां ससुर खदेडी नदी पर काम चल रहा है। नाम इतना दिलचस्प
हैं कि स्वभाविक सी बात है इस नाम के पीछे कोई कहानी जरूर होगी और है, भी। किसी दिन
ससुरखदेडी पर बात करेंगे।


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