नौ दिन नौ नदियां
नदी जिसने हस्तशिल्प को दिलाई वैश्विक पहचान
छठा
दिन, छठी नदी बाग
नौ
दिन, नौ नदियां में आज बात उस नदी की, जो आकार में छोटी हैं लेकिन दुनियाभर में मध्यभारत
की एक हस्तशिल्प विधा को पहचान दिलाने का श्रेय इस नदी को जाता है। ये हैं, मध्यप्रदेश
की बाग नदी, जिसके किनारे बाग प्रिटिंग का विकास हुआ और आज बाग प्रिंट दुनियाभर में
पहचानी जाती है।
धार जिले से बहने वाली इस नदी को कई नामों से जाना जाता है जैसे बाग, बागी, बागिनी, बाघिनी। इसी नदी के नाम पर बाग प्रिंट का नामकरण हुआ। कहते हैं कि बाग प्रिंट का इतिहास हजार वर्ष पुराना है। कुछ लोग इसका जन्म राजस्थान में मानते हैं, वहीं कुछ का कहना है कि इसका प्रारंभ लड़काना सिंध में हुआ, जो वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है। बाग ग्राम में बसे कारीगरों के अनुसार उनके पूर्वज तकरीबन 400 साल पहले सिंध लड़काना (वर्तमान में पाकिस्तान) से धार जिले के समीप स्थित बाग गांव में पहुंचे थे और तभी से यहां बाग प्रिंट का काम जारी हैं।
वे लोग पाकिस्तान से यहां
विस्थापित क्यों हुए? इस कारण स्पष्ट नहीं है, कुछ को लगता है कि शायद बाघिनी नदी ही
वो वजह है जिसके कारण उनके पूर्वज यहां आए। गांव से नदी का सामीप्य और नदी के पानी
के रासायनिक घटक दोनों ही इस शिल्प को प्रोत्साहित करते हैं। बाघिनी नदी के पानी में
प्राकृतिक रूप से कॉपर सल्फेट पाया जाता है जो बाग प्रिंट के लिए इस्तेमाल किये जाने
वाले प्राकृतिक रंगों को एक खास किस्म की चटक प्रदान करता है।
दरअसल
इस प्रिंट में सिर्फ प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है और नदी के पानी से उन
रंगों की चटक कई गुना बढ़ जाती है। बाग प्रिंट देश और दुनिया में जितना लोकप्रिय है,
बाग नदी उतनी ही उपेक्षित। इस नदी के बारे में सही दस्तावेजीकरण का अभाव नजर आता है।
मध्यप्रदेश के लोग ही इस नदी के नाम, उदगम और प्रवाह के अंतिम बिंदु के बारे में ठीक
से नहीं जानते। ना ही इस संबंध में जानकारियां आसानी से उपलब्ध है।
नदी
के किनारे सभ्यता का विकास होता है, संस्कृति, शिल्प, व्यापार पनपता है। नदियों ने
हमें सबकुछ दिया है, अब हमारी बारी है नदियों को उनका जीवन लौटाने की।


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