नौ दिन, नौ नदियां
रामगंगा: परशुराम के सामीप्य से पाया नाम
इसलिए कहते हैं, हर-हर गंगे
नौ दिन, नौ नदियां में आज मिलते हैं रामगंगा से। यह भी उत्तराखंड की पहाड़ियों से निकलकर उत्तरप्रदेश के मैदानों का सफर तय करते हुए अंतत: गंगा नदी में समा जाती है। रामगंगा के बारे में कहा जाता है कि अगर यह नहीं होती तो कुमाउं क्षेत्र के कई गांव प्यासे रह जाते। अपनी यात्रा को पूर्ण करने से पहले रामगंगा मनुष्यों के साथ बाघ, चीतों, हाथियों और अनगिनत वन्य जीवों की प्यास बुझाती हैं।
कभी
सोचती हूं तो हैरान हो जाती हूं कि कैसे प्रकृति ने इतनी धाराएं बनाई, इनके रास्ते
बनाएं और इन्हें अंतत: गंगा में समाहित करवा दिया। शायद यही कारण हैं कि लोग चाहे किसी
भी नदी या सरोवर के पानी से स्नान करे, नदी के प्रति आभार जताते हुए बोलते तो हर-हर
गंगे ही हैं। सच भी हैं, भारत की ज्यादातर नदियां अंतत: जाकर गंगा में ही समा जाती
है, इस जुडाव के नाते कह सकते हैं- हर, हर गंगे।
गंगा
की तरह रामगंगा नदी का भी पौराणिक महत्व हैं, पुराणों में इसे रथवाहिनी का नाम दिया
गया है। जिन पर्वतों से रामगंगा का उद्गम हुआ, वहां परशुराम जी ने तपस्या की थी, संभवताया
उन्हीं के नाम पर इसे नाम मिला- रामगंगा।
भारत
की अन्य नदियों की तरह रामगंगा के समक्ष भी औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट मिल जाने के
कारण कई समस्या आई हैं, नदी का साथ देने के लिए उत्तराखंड के लोगों ने भी कमर कसकर
प्रयास किये हैं। उत्तराखंड की भूमि से कई नदियां जन्म लेती हैं, पहाडों की इस खूबसूरत
विरासत को हम मैदान के लोग कैसे सहेजते हैं? यह तरीका ही तय करेगा कि भविष्य में हम
सुखी समपन्न समुदाय होंगे या प्यासी, अभावग्रस्त भीड़।

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