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Showing posts from 2022

सकल कलुष निवारणी गंगे

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  नौ दिन नौ नदियां नौवां दिन, नौवीं नदी गंगा नौ दिन, नौ नदियां में नौवें दिन जानिए गंगा के बारे में: गंगा का नाम लेते ही जहन में तस्वीर उभरती हैं कलरव करती बहती धारा और उसमें आचमन करते लोगों की। हिमालय से उतरकर बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ते हुए गंगा दुनिया के सबसे ऊपजाऊ मैदानों को सिंचती हुई, असंख्य जीवों की प्यास को तृप्त करती हुई आगे बढ़ती है। गंगा के नाम पर कई कीर्तिमान हैं मसलन दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा गंगा नदी बनाती है। ऋग्वेद में गंगा का जिक्र हैं, महाभारत में गंगा का वर्णन हैं, रामायण में श्रीराम का केवट की नाव पर सवार होकर गंगा नदी पार करने के प्रसंग का उल्लेख हैं। अपने उदगम से सागर मिलन तक गंगा 2500 किलोमीटर का मार्ग तय करती हैं। इस पापमोचनी, मोक्षदायिनी नदी से हम सचमुच अपनी मां की तरह प्रेम करते हैं। जिस तरह मां से बहुत प्रेम करने के बावजूद शायद हम अपनी मां का उतना ख्याल नहीं रख पाते, जितना रखना चाहिए था। बस वैसा ही कुछ गंगा के साथ भी हैं, हम इससे प्रेम बहुत करते हैं पर यह प्रेम हमारी भावना, आस्था और स्मृतियों तक सीमित रह जाता हैं। हमारी मां हमसे क्या चाह रही हैं, आमतौर पर ह...

जितने नाम, उतनी कथाएं ब्रह्मपुत्र

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  नौ दिन, नौ नदियां आठवां दिन, आठवीं नदी – ब्रह्मपुत्र नौ दिन, नौ नदियां श्रृंखला के आठवें दिन बात करते हैं ब्रह्मपुत्र की। इसके किनारे फैले हैं - चाय के बागान, इस तरह चाय के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्मपुत्र रोज सुबह हमारे दिन का हिस्सा बन जाता है।  साफ पानी से लबालब भरा ब्रह्मपुत्र तिब्बत से बहते हुए भारत और भारत से बांग्लादेश पहुंच जाता है, जी हां, पहुंच जाता है क्योंकि पौराणिक संदर्भों में यह नदी नहीं नद है। यह ब्रह्मा का पुत्र है। भारत की तमाम नदियों को पौराणिक संदर्भों में स्त्री रूप में चित्रित किया गया है। ब्रह्मपुत्र और सोनभद्र पुरूष रूप में वर्णित है इसलिए अंग्रेजी भाषा और विश्वपटल पर ये रिवर है लेकिन भारतीय समुदाय में ये नद है। इसके कई नाम हैं और हर नाम के साथ एक कहानी जुड़ी है। इसका उद्गम हिमालय के उत्तर में तिब्बत के पुरंग जिले में मानसरोवर झील के निकट से होता है। तिब्बत में इसे यारलुंग सांपो कहते हैं। अरूणाचल प्रदेश में सियांग और धियांग, असम में ब्रह्मपुत्र, बंग्लादेश में यमुना के नाम से पुकारा जाता है। ब्रह्मपुत्र का बांग्लादेश में गंगा से संगम होता है। बां...

नौ दिन, नौ नदियां

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    सातवां दिन , सातवीं नदी कावेरी कहानी ब्रह्मा पुत्री की … आज बात करते हैं , उस नदी की जो स्वर्गलोक में ब्रह्मा की पुत्री थी , भगवान गणेश के हाथों वो एक नदी में तब्दील हो गई और हजारों वर्षों से धरती की प्यास बुझा रही है। ये कहानी है - कावेरी नदी की। भारत की पवित्र नदियों में से एक कावेरी के जन्म की कई कथाएं धर्मग्रंथों में और जनश्रुतियों में सुनने को मिलती है। भौगोलिक रूप से देखा जाए तो पश्चिम घाट की ब्रह्मगिरी पर्वत श्रृंखला पर तालकावेरी नामक कुंड से कावेरी का जन्म होता है। यहां से तमिलनाडु और कर्नाटक राज्य में 800 किलोमीटर की यात्रा कर कावेरी बंगाल की खाड़ी में समा जाती है। तमिल साहित्य में कावेरी को पोन्नी नाम से पुकारा गया है , कही - कही इसका जिक्र स्वर्णदासी के नाम से भी हैं। स्वर्णदासी की संज्ञा इसके किनारों पर जमा होने वाली सुनहरी रेत की वजह से दी गई। यह नदी दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु और कर्नाटक के खेतों में सिंचाई का प्रमुख स्रोत है। यहां लोग इसे कावेरी अम्मा के रूप में पूजते हैं। बहुप्रचलित कथा के मुताबिक ब्रह्माजी की एक पुत्री विष्णुमाया थी , जो पृथ्वी ...

नौ दिन नौ नदियां

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 नदी जिसने हस्तशिल्प को दिलाई वैश्विक पहचान छठा दिन, छठी नदी बाग नौ दिन, नौ नदियां में आज बात उस नदी की, जो आकार में छोटी हैं लेकिन दुनियाभर में मध्यभारत की एक हस्तशिल्प विधा को पहचान दिलाने का श्रेय इस नदी को जाता है। ये हैं, मध्यप्रदेश की बाग नदी, जिसके किनारे बाग प्रिटिंग का विकास हुआ और आज बाग प्रिंट दुनियाभर में पहचानी जाती है। धार जिले से बहने वाली इस नदी को कई नामों से जाना जाता है जैसे बाग, बागी, बागिनी, बाघिनी। इसी नदी के नाम पर बाग प्रिंट का नामकरण हुआ। कहते हैं कि बाग प्रिंट का इतिहास हजार वर्ष पुराना है। कुछ लोग इसका जन्म राजस्थान में मानते हैं, वहीं कुछ का कहना है कि इसका प्रारंभ लड़काना सिंध में हुआ, जो वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है। बाग ग्राम में बसे कारीगरों के अनुसार उनके पूर्वज   तकरीबन 400 साल पहले सिंध लड़काना (वर्तमान में पाकिस्तान) से धार जिले के समीप स्थित बाग गांव में पहुंचे थे और तभी से यहां बाग प्रिंट का काम जारी हैं।  वे लोग पाकिस्तान से यहां विस्थापित क्यों हुए? इस कारण स्पष्ट नहीं है, कुछ को लगता है कि शायद बाघिनी नदी ही वो वजह है जिस...

नौ दिन, नौ नदियां

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  एक शापित नदी, जिसके श्राप ने रखा उसे स्वच्छ नौ दिन, नौ नदियां में आज बात एक शापित नदी की, ऐसी नदी जिसे द्वापर युग में द्रौपदी ने श्राप दिया था। कलयुग में यही श्राप नदी का रक्षक बन गया, लोगों ने नदी से दूरी बनाकर रखी नतीजतन आज इस नदी का एक बड़ा हिस्सा प्रदूषण से मुक्त हैं और जलीय जंतुओं के आवास के लिए पूरी तरह अनुकूलित भी। यह कहानी है- चंबल नदी की। मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में स्थित जानापाव की पहाड़ी से सात नदियों का उद्भव हुआ हैं- इन्हीं सात नदियों में से एक हैं- चंबल। अपनी छह बहनों के साथ जन्म लेने के बाद चंबल लंबा सफर तय कर के यमुना में मिल जाती है। यह गंगा बेसिन की महत्वपूर्ण नदियों में से एक हैं। जानापाव से चंबल का प्रारंभ होना हमारे जमाने का भौगोलिक सत्य है किंतु इसके जन्म के संबंध में कुछ अजीब सी कथाएं भी प्रचलित हैं। इस नदी का जिक्र महाभारत, श्रीमद् भागवत और कालिदास के मेघदूत में भी हैं। एक कथा के मुताबिक रंतिदेव नामक राजा ने विशाल यज्ञ करवाया था, जिसमें कई पशुओं को अग्निहोत्र को समर्पित किया गया, उन्हीं पशओं की त्वचा की नमी से एक नदी उत्पन्न हुई, जिसे चर्मावती कहा गया। ...

नौ दिन, नौ नदियां

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नमामि देवी नर्मदे    नौ दिन, नौ नदियां में आज बात करेंगे एक रूठी हुई प्रेयसी के बारे में, कहते हैं कि अपने मंगेतर की दगाबाजी के खफा होकर वो उल्टी दिशा में बढ़ गई और ऐसी चली कि एक प्रदेश की जीवनरेखा बन गई। ये कहानी है नर्मदा नदी की। मध्यप्रदेश को सुफलाम और गुजरात को सुजलाम बनाने वाली नर्मदा या रेवा लोककथाओं में एक रूठी हुई प्रेमिका है। नर्मदा के उद्गम से लेकर सागर के संगम तक के सफर को जानने के बाद मेरा मन नर्मदा के लिए एक अलग ही कहानी बुनता है। मुझे नर्मदा एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की की तरह दिखाई देती है, जिसके पास ग्लेशियर की पैतृक संपत्ति नहीं है। फिर भी वो जिंदगी की राह पर आगे बढ़ती है, जो पत्थर, पहाड़ उसे रोकते हैं, उन्हें तोड़कर अपना रास्ता बना लेती है। वहीं जो धाराएं, झरने, वन, वृक्ष उसका साथ देते हैं, उनसे दोस्ती निभाते हुए बढ़ती चली जाती है। भारत की ज्यादातर विशाल नदियों से नर्मदा की यात्रा एकदम अलग है। हिमालय और उसकी तराई से निकलने वाली नदियों को सालभर बर्फ से पानी के रूप में पॉकेटमनी मिल जाती है, नर्मदा जैसी नदियों के पास यह पॉकेटमनी नहीं है। मध्यप्रदेश के अमरकं...

नौ दिन, नौ नदियां

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  नदी जिसने खोया था नाम और पहचान कान्ह नदी नौ दिन, नौ नदियां में आज बात करते हैं, उस नदी के बारे में जिसका नाम अंग्रेजी जुबां की गलती से बदल गया और बदला तो ऐसा बदला कि उसके अपने भी उसका सही नाम भूल गए। बहरहाल नाम क्या गया, नदी की पहचान ही धीरे-धीरे गुम हो गई। कहते हैं कि सबका वक्त आता है, इसका वक्त भी आया, नाम दोबारा मिला और पहचान फिर जिंदा हुई और ऐसे जिंदा हुई कि देश के सामने एक उदाहरण कायम हो गया। हम बात कर रहे हैं इंदौर कि कान्ह नदी की। हर इंदौरी जानता है कि एक समय था, जब नदी नाले में बदल चुकी थी और उसका नाम कान्ह से खान हो गया था। दरअसल अंग्रेजी शासन के दौरान अंग्रेजो को कान्ह शब्द शुद्धता से बोलना नहीं आता था लिहाजा उनके मुंह से कान्ह, खान बन गई। जो बोला वहीं दस्तावेजों में दर्ज कर दिया। धीरे-धीरे समय बदला। औद्योगिकरण, शहरीकरण, विकास की नई-नई अवधारणाओं ने मालवा की जमीन पर पैर रखा। हर एक ने अपना अपशिष्ट कान्ह के किनारों तक पहुंचा दिया। कचरा और अपशिष्ट धीरे-धीरे उसकी पहचान बन गया। गंदे नाले में तब्दील कान्ह मुझे अच्छे से याद है कि स्कूल में जनरल नॉलेज की कक्षा में हमने कान्ह...

नौ दिन, नौ नदियां

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   रामगंगा: परशुराम के सामीप्य से पाया नाम इसलिए कहते हैं, हर-हर गंगे नौ दिन, नौ नदियां में आज मिलते हैं रामगंगा से। यह भी उत्तराखंड की पहाड़ियों से निकलकर उत्तरप्रदेश के मैदानों का सफर तय करते हुए अंतत: गंगा नदी में समा जाती है। रामगंगा के बारे में कहा जाता है कि अगर यह नहीं होती तो कुमाउं क्षेत्र के कई गांव प्यासे रह जाते। अपनी यात्रा को पूर्ण करने से पहले रामगंगा  मनुष्यों के साथ बाघ, चीतों, हाथियों और अनगिनत वन्य जीवों की प्यास बुझाती हैं।   दरअसल यह नदी जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान से बहती हुई आगे बढ़ती है। रामगंगा का उद्गम उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल जिले की दूधातोली पहाडियों की दक्षिण ढ़लानों में स्थित दीवाली खाल नामक स्थान से होता है। पहाडियों से उतरकर मैदानों से तक पहुंचने से पहले यह मनुष्यों को पानी, बिजली और कई अन्य उपहार देती है। इस दौरान कई छोटी जलधाराएं, नाले और नदियां रामगंगा में मिलते हैं जैसे किच्छा, कोशी, खोह, देवरनियां, नकटिया जैसी नदियां रामगंगा में समा जाती है। अंतत: कन्नौज के समीप इसका संगम गंगा से होता है। कभी सोचती हूं तो हैरान हो जाती हूं कि कैसे प...

नौ दिन, नौ नदियां

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         कहानी काली , धौली और गोरी गंगा की कहते हैं कि दुनिया की सबसे हुनरमंद कलाकार प्रकृति हैं। वह इंजीनियरिंग भी जानती है और चिकित्सा भी। प्रबंधन की भी विशेषज्ञ हैं और ललित कलाओं की भी।   प्रकृति की नायाब इंजीनियरिंग का एक उदाहरण हैं , भारत के नदीतंत्र। छोटी , छोटी जलधाराएं मिलकर जो विशाल नदीतंत्र भारत में बनाती हैं , वैसा दुनिया में कही और मिलना मुश्किल हैं। नवरात्री का वक्त हैं और नदियां भी हमारे लिए देवीतुल्य और मातृतुल्य पूजनीय हैं। तो चलिए शक्ति की आराधना के अवसर पर जानते हैं , हमें जीवन शक्ति देने वाली कुछ नदियों के बारे में , जो बहते हुए , एक - दूसरे में समाती हैं और एक विशाल नदी को पूर्णता प्रदान करती हैं।   इंसान और पशुओं की प्यास बुझाती हैं , खेतों को पानी से तृप्त करती है और धरती को सुदंर बनाती है। आज पहले दिन आईए जानते हैं कालीगंगा के बारे में …       कालीगंगा, गंगा की उपसहायक नदियों में से एक हैं। उपसहायक नदी की सहायक नदियों में शामिल कई अन्य नदियों में दो के नाम बहुत दिलचस्प हैं- गोरी गंगा और धौली गंगा। कालीगंगा को...